छठ पूजा का महापर्व: क्यों रखा जाता है 36 घंटे का निर्जला व्रत? जानें इसके नियम और अद्भुत लाभ

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आज यानी 25 अक्टूबर, दिन शनिवार से छठ पूजा की शुरुआत होती है। हिंदू धर्म में छठ पूजा एक मुख्य पर्व है, यह पर्व खासतौर पर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है। छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला व्रत होता है, जिसमें व्रती बिना भोजन और पानी के उपवास रखकर सूर्य देव की आराधना करते हैं। पहला दिन ‘नहाय-खाय’, दूसरा दिन ‘खरना’, तीसरा दिन ‘संध्या अर्घ्य’ और चौथा दिन ‘उषा अर्घ्य’ कहलाता है। श्रद्धालु सूर्यास्त और सूर्योदय के समय जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। माना जाता है कि इस पूजा से सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संतान की दीर्घायु की प्राप्ति होती है। महिलाएं छठ पूजा के दौरान 36 घंटे बिना अन्न और जल के निर्जला उपवास रखती हैं। आइए आपको छठ पूजा के दौरान निर्जला व्रत रखने का सही तरीका, नियम और लाभ।

निर्जला व्रत रखने का सही तरीका और नियम

खरना के दिन शाम को व्रती गुड़ और चावल की खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद से 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ शुरु हो जाता है। व्रत के दौरान अवधि में व्रती को अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करना होता है। इसके साथ ही व्रत में मन को शांत रखना, सात्विक व्यवहार करना और धरती पर साफ कंबल या चटाई बिछाकर सोना जरुरी है। इसके तीसरे दिन डूबते सूर्य को और चौथे दिन उगते समय सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। जो लोग व्रत के नियमों का पालन करने से छठ मैया का आशीर्वाद मिलता है।

छठ पूजा में निर्जला व्रत करने के लाभ

धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्यदेव को आरोग्य का देवता कहा जाता है। माना जाता है कि छठ व्रत रखने से व्रती और उसके परिवार को उत्तम स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही व्रत को पवित्रता और अनुशासन रखने से व्रती की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनीं रहती है। इस व्रत के रखने से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, कुशलता और संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए फलदायक माना जाता है। 

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