उसने वर्ष 2013 से 2016 तक मासिक किश्तों के रूप में कॉलोनाइजरों के पास 1.25 लाख रुपये जमा कराए थे। जब प्लाट की रजिस्ट्री की बारी आई तो उसे पता चला कि न तो कालोनी का ले-आउट स्वीकृत है और न ही डायवर्शन है। कॉलोनाइजरों ने उसके रुपये भी वापस नहीं दिए। जिसके बाद उसने जिला प्रशासन के पास शिकायत दर्ज कराई थी।
