ये कैसा सिस्टम:नियम कहले है- डिलीवरी के बाद एंबुलेंस से छोड़ना है घर तक, लेकिन हकीकत: प्राइवेट गाड़ी और ऑटो से ही जाना मजबूरी

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राज्य के सबसे बड़े अंबेडकर अस्पताल समेत सभी सरकारी अस्पतालों में इस तरह के नजारे रोज दिखाई दे रहे हैं। राज्य सरकार का सख्त नियम है कि गर्भवती महिलाओं को बच्चा होने के बाद और गंभीर बीमारियों के मरीजों को अस्पताल से डिस्चार्ज करने के बाद सरकारी एंबुलेंस से ही उन्हें घर वापस पहुंचाना है। लेकिन किसी भी सरकारी अस्पताल में एक गाड़ी ऐसी नहीं दिखती जिससे गंभीर जरूरतमंदों को घर पहुंचाया जा सके। अंबेडकर अस्पताल से सरकारी एंबुलेंस ड्राइवर समेत गायब हो जाते हैं। टोल फ्री नंबर पर फोन लगाने के बावजूद भी सरकारी गाड़ी वाले अस्पताल के दरवाजे तक नहीं पहुंच रहे हैं। सरकारी गाड़ी की सुविधा नहीं मिलने की वजह से हर दिन बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाएं बच्चा होने के बाद, कैंसर, लकवा समेत गंभीर बीमारी से पी​िड़त मरीज डिस्चार्ज होने के बाद खुद की रकम खर्च कर घर पहुंच रहे हैं। हर सरकारी अस्पताल के बाहर दर्जनों निजी एंबुलेंस वाले ऐसे मरीजों से ज्यादा किराया लेने के लिए तैयार रहते हैं। छोटी-छोटी दूरी के लिए भी हजार रुपए से कम नहीं लिया जाता है। इतना ही नहीं ऑटो वाले भी ऐसे मरीजों से जमकर किराया वसूल करते हैं। अस्पताल के बाहर ही ऑटो स्टैंड होने की वजह से लोग ज्यादा दूर नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि उनके साथ मरीज होते हैं। ऐसे में ऑटो वाले भी जो मनमाना किराया मांगते हैं लोग दे देते हैं। इस वजह से ऐसे मरीजों की परेशानी और बढ़ जाती है। अस्पताल परिसर में ही खड़े रहते हैं ऑटो
अंबेडकर अस्पताल के गेट नंबर 1 में ही प्राइवेट एंबुलेंस और ऑटो रिक्शा वाले लाइन लगाकर खड़े रहते हैं। किसी मरीज को इमरजेंसी में लेकर कोई एंबुलेंस आए तो उसे 2 मिनट तो गेट पर ही खड़ा होना पड़ता है, क्योंकि गेट में पहले से ही ऑटो वाले बेतरतीब ढंग से खड़े रहते हैं। गेट के अलावा टो और प्राइवेट एंबुलेंस वाले अस्पताल परिसर के अंदर भी खड़े रहते हैं। अस्पताल से कोई भी निकलता है वे तुरंत उनके पास दौड़ने लगते हैं। किराये को लेकर मोल-भाव चलता रहता है। डिस्चार्ज होने के बाद पैदल ढूंढते रहे ऑटो
अपनी पत्नी को लेकर घर जा रहे रौशन ने बताया कि बुधवार को उनकी पत्नी को अंबेडकर अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया है। उनका परिवार गुढ़ियारी में रहता है। वे महतारी एक्सप्रेस से अपनी पत्नी को लेकर अस्पताल आए थे। अब बेटी होने के बाद घर वापस जा रहे हैं। महतारी एक्सप्रेस में फोन लगाया था, लेकिन गाड़ी वाले नहीं आए। ऑटो में ही पत्नी और बच्चे के साथ घर जाना पड़ा। 102 केवल गर्भवती महिलाओं के लिए वह भी पेड़ की छांव में करते हैं आराम अंबेडकर अस्पताल, जिला अस्पताल और कालीबाड़ी शिशु अस्पताल सभी जगहों पर 2-2 महतारी एक्सप्रेस-102 की ड्यूटी लगाई गई है। इनका काम है कि वे गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के बाद डिस्चार्ज होने के बाद उन्हें वापस घर भी छोड़े। लेकिन अंबेडकर अस्पताल में जिन वाहनों की ड्यूटी लगी है वे कॉल आने पर मरीजों को अस्पताल तो लाते हैं, लेकिन वापस छोड़ने के समय वे गायब हो जाते हैं। भास्कर टीम ने लगातार पांच दिन तक इसकी जांच भी की। रोजाना दिखाई दिया कि गाड़ी वाले गर्भवती महिलाओं को न तो अस्पताल पहुंचाने में दिलचस्पी दिखाते हैं और न ही उन्हें घर तक पहुंचाते हैं। अंबेडकर अस्पताल में इमरजेंसी गेट से 250 मीटर दूर पेड़ की छांव में गाड़ी को पार्किंग में खड़ी कर आराम करते रहते हैं। अधीक्षक की चेतावनी भी काम नहीं आ रही ड्राइवर ड्रेस नहीं पहनते, आईडी भी नहीं लगाते
दो दिन पहले ही अस्पताल अधीक्षक ने अस्पताल को वाहन शाखा को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी। पत्र में लिखा गया था कि अस्पताल के पदस्थ वाहन चालक अपनी ड्यूटी के दौरान यूनिफॉर्म में नहीं रहते। जिसके चलते मरीजों व उनके परिजनों को परेशानियां होती हैं। वे सरकारी ड्राइवरों को पहचान नहीं पाते हैं। उनके गले में आईडी भी नहीं होती है। ऐसे में ड्राइवर आसानी से इधर-उधर समय काटकर वापस चले जाते हैैं। इससे मरीजों को काफी परेशानी हो रही है। ऐसे लोगों पर कार्रवाई करने की चेतावनी देने के बावजूद अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ है। अस्पताल परिसर में गाड़ी और ड्राइवर दोनों ही गायब रहते हैं। इस संबंध में अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि सरकारी एंबुलेंस वाले मौके पर नहीं मिलते हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए महतारी एक्सप्रेस की सुविधा है। 102 में कॉल कर गाड़ियां बुला सकते हैं। गाड़ी नहीं आ रही है तो इसकी​ शिकायत की जा सकती है। अंबेडकर अस्पताल से केवल न्यूरो पेशेंट को डीकेएस में रेफर किया जाता है, इसके लिए एंबुलेंस खड़ी रहती है।
संतोष सोनकर, अधीक्षक अंबेडकर अ.

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