राशन का इंतजार कर रहे थे…मिलते ही ठिकाना बदलते:सरेंडर-नक्सली के इनपुट से मारे गए 26 नक्सली, ग्रामीण बोले-फायरिंग सुनकर हम घरों में छिपे थे

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दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले की सरहद पर नक्सली राशन के लिए इंतजार कर रहे थे। नक्सलियों को राशन मिल जाता तो ठिकाना बदल देते, लेकिन सरेंडर नक्सली दिनेश का इनपुट एकदम सटीक निकला। ठिकाना बदलने से पहले जवानों ने नक्सलियों को 3 लेयर में घेर लिया। नक्सली राशन के लिए एंड्री, पीडिया और लोहा गांव पर डिपेंड थे। यहां ग्रामीणों पर दबाव बनाते और राशन लेकर जाते थे। ज्यादातर राशन एंड्री गांव से ही नक्सल ठिकाने तक पहुंचता था। इसी इनपुट पर करीब 1000 जवान नक्सलियों के हार्ड कोर इलाके में घुसे। एंड्री गांव के जंगल में 26 नक्सलियों को एनकाउंटर में मार गिराया। मारे गए नक्सलियों में 14 महिला और 12 पुरुष शामिल हैं। मुठभेड़ इतनी भीषण थी कि एंड्री, मुतवेंडी और लोहा गांव तक गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई दी। ग्रामीणों ने कहा कि फायरिंग की आवाज सुनकर घरों में छिप गए थे। अब जानिए कहां और कैसे हुआ नक्सलियों का एनकाउंटर ? दरअसल, बैलाडीला की पहाड़ियों के पीछे एंड्री गांव बसा हुआ है। इसी खड़ी पहाड़ी के ऊपर नक्सलियों का ठिकाना था। 20 मार्च से पहले तक नक्सलियों की पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी इसे अपना सबसे सुरक्षित ठिकाना मानती थी। सरेंडर नक्सली के इनपुट पर बीजापुर जिले से DRG, STF, CRPF, बस्तर फाइटर्स की टीम शामिल थी। सुकमा से DRG और दंतेवाड़ा जिले से CAF के जवान ऑपरेशन पर निकले थे। 19 मार्च की रात जवान पहाड़ की चोटी पर पहुंचे, लेकिन 20 मार्च की सुबह नक्सलियों को भनक लग गई। नक्सलियों ने एंड्री गांव की खड़ी पहाड़ी से जवानों पर फायरिंग शुरू कर दी, लेकिन जवान अपने कंधों पर 25 किलो का वजन रखकर गोलियों की बौछारों के बीच खड़ी चढ़ाई चढ़े। पहाड़ को 10 घंटे तक जवानों ने घेरकर रखा और 93 लाख रुपए के इनामी नक्सलियों का एनकाउंटर किया। मौके पर गोलियों के खोखे, खून के धब्बे और नक्सल स्मारक भी जवानों और नक्सलियों के बीच जिस जगह पर मुठभेड़ हुई, वहां जगह-जगह पर खून के धब्बे, गोलियों के खोखे बिखरे मिले हैं। पेड़ों पर गोलियों के निशान भी देखे गए। इसके अलावा एंड्री पहाड़ चढ़ने से पहले नक्सलियों के 4 शहीदी स्मारक भी थे। ये इलाका नक्सलियों का आधार क्षेत्र था। हर एक जवान के शरीर पर 25 किलो का वजन गर्मी और पतझड़ के मौसम में जवानों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं। हर जवान जो ऑपरेशन के लिए निकलता है, उसके कंधे पर करीब 25 किलो का वजन होता है। वे अपने साथ 5 से 6 किलो वजन की बंदूक, गोलियां, राशन का सामान और पानी की बोतलें रखते हैं। साथ ही हैवीवेट के जूते और वर्दी भी होती है। एंड्री गांव में 25 किलो वजन लेकर जंगलों की खाक छानना और पहाड़ चढ़कर नक्सलियों को मारना जवानों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। ग्रामीण बोले- मुठभेड़ भीषण थी मुठभेड़ वाले इलाके के ग्रामीणों ने बताया कि 20 तारीख की सुबह करीब 6 से 7 बजे के बीच हम महुआ बीनने जंगल जा रहे थे, तभी गोलियों की आवाज सुनाई दी। आवाज बहुत तेज आ रही थी। सुनसान जगह है, इसलिए करीब 2 से ढाई किलोमीटर तक गोलियों की आवाज सुनाई दी। अब जानिए कैसा है इलाका ये हैं चर्चित बड़े लीडर फैक्ट फाइल मुठभेड़ में एक जवान शहीद दोनों तरफ से हुई गोलीबारी में बीजापुर DRG का एक जवान राजू भी शहीद हो गया। बस्तर IG सुंदरराज पी के मुताबिक, यह सरेंडर नक्सली था। माओवाद संगठन का हथियार छोड़ने के बाद इसने दोबारा देश की रक्षा के लिए हथियार उठाए थे। नक्सलियों से लड़ते हुए जवान ने अपनी शहादत दी। अब जानिए पतझड़ में ऑपरेशन क्यों होता है मुश्किल ? 1 मार्च से जून के पहले सप्ताह तक नक्सलियों का TCOC महीना चलता है। पतझड़ के मौसम में जवानों को ऑपरेशन के दौरान मुश्किल होती है, क्योंकि जंगलों में सूखे पत्ते जमीन पर गिरे रहते हैं। उस पर एक साथ चलने से आवाज आती है। जंगल में सन्नाटे के बीच नक्सलियों को इस बात का अंदेशा हो जाता है कि जंगल में कुछ सुगबुगाहट है, जिससे वह पहले से ही अलर्ट हो जाते हैं। इसके अलावा विजिबिलिटी साफ होती है। दूर से आता हुआ व्यक्ति भी दिख जाता है। हालांकि जवानों को काफी सावधानी पूर्वक ऑपरेशन करना होता है। …………………………………………… नक्सली ने ही बताया नक्सलियों का ठिकाना…तब 30 मरे: बीजापुर में 26, कांकेर में 4 ढेर; TCOC महीने में ही नक्सलियों को बड़ा नुकसान छत्तीसगढ़ के बस्तर में जवानों ने दो अलग-अलग मुठभेड़ों में कुल 30 नक्सलियों को मार गिराया। बीजापुर में 26 और कांकेर में 4 नक्सली मारे गए। नक्सलियों को उनके TCOC (टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन) माह में ही सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। सूत्रों के अनुसार हमला एक हफ्ते पहले सरेंडर किए नक्सली दिनेश मोड़ियाम की निशानदेही पर किया गया था। पढ़ें पूरी खबर…

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