छत्तीसगढ़ की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जो सिर्फ नाम नहीं, पहचान हैं। इन परिवारों की कहानियां सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की चौपाल तक गूंजती हैं। आज, अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस के मौके पर, जानते हैं उन राजनीतिक परिवारों की कहानियां, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की राजनीति को आकार दिया। राज्य में प्रमुख दलों की सियासत के केंद्र में यही परिवार रहे। कुछ घराने ऐसे हैं, जिन्होंने विरासत में मिली सियासत को बखूबी संभाला और आगे बढ़ निकले। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी मुट्ठी से जनता के बीच बनी लोकप्रियता रेत की तरह फिसलती जा रही है, लेकिन जरूर है कि इस रेत को संभालने के लिए वे आज भी लगे हुए हैं। शुक्ल परिवार: छत्तीसगढ़ की राजनीति की शुरुआत यहीं से होती है अविभाजित मध्यप्रदेश में जब सत्ता की बात होती थी, तो शुक्ल परिवार का नाम सबसे ऊपर आता था। पंडित रविशंकर शुक्ल, श्यामा चरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गजों ने इस परिवार को राजनीति की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। लेकिन समय के साथ, यह चमक धीमी पड़ गई। मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ सियासत में बड़ा दखल इस परिवार का रहा। पं. रविशंकर शुक्ल मध्यप्रदेश के पहले सीएम रहे। इसके बाद उनके बेटे श्यामाचरण शुक्ल 3 बार मुख्यमंत्री रहे। विद्याचरण शुक्ल, इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में मंत्री रहे और अब श्यामा चरण शुक्ल के बेटे अमितेश शुक्ल राजनीति में हैं। वे पूर्व में मंत्री रह चुके हैं। राजिम इस परिवार की पारम्परिक सीट रही है। विरासत: पं. रविशंकर शुक्ल (मप्र के पहले सीएम), श्यामा चरण शुक्ल (तीन बार मप्र सीएम), विद्या चरण शुक्ल (पूर्व विदेश मंत्री)। अब कौन सक्रिय: अमितेश शुक्ल (पूर्व मंत्री, कांग्रेस नेता)। मौजूदा स्थिति: अमितेश शुक्ल कांग्रेस में सक्रिय, लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। राजनीतिक प्रभाव: कभी अविभाजित मध्यप्रदेश राजनीति का चेहरा रहा यह परिवार अब सीमित भूमिका में है। जोगी परिवार: एक मुख्यमंत्री, एक पार्टी, एक उत्तराधिकारी और अब अस्तित्व की लड़ाई अजीत जोगी, एक आईएएस अधिकारी से राजनीतिज्ञ बने, छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने। राजीव गांधी के कहने पर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस पार्टी में विभिन्न पदों पर कार्य किया। इसके बाद जब भाजपा की सरकार रही। तब भी वे सांसद-विधायक रहे। 2016 में, उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर ‘जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जोगी)’ की स्थापना की। हालांकि, उनकी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 2006 में उनकी पत्नी पहली बार कोटा से विधायक रहीं और फिर इस सीट से जोगी परिवार लगातार जीत हासिल करता रहा। लेकिन 2023 में रेणु जोगी को भी हार मिली। पाटन से जोगी के बेटे अमित जोगी भी चुनाव लड़े, लेकिन उनको बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। विरासत: अजीत जोगी (छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री), जनता कांग्रेस (जोगी) के संस्थापक। मौजूदा स्थिति: JCCJ 2023 के चुनाव में पूरी तरह फ्लॉप। अजीत जोगी के निधन के बाद, उनके बेटे अमित जोगी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को कोई सीट नहीं मिली, जिससे पार्टी की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है। राजनीतिक प्रभाव: जोगी परिवार अब प्रतीकात्मक राजनीतिक पहचान तक सिमट गया है। पार्टी भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कश्यप परिवार: बस्तर में आज भी पकड़, लेकिन ताकत पहले जैसी नहीं सियासी पृष्ठभूमि में बस्तर का प्रतिनिधित्व बस्तर के बली दादा यानी स्व. बलिराम कश्यप ने दिल्ली तक किया था। बस्तर में बीजेपी को स्थापित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है, वे चार बार लोकसभा के सांसद रहे। उनके बाद उनके बेटे दिनेश कश्यप भी सांसद बने। दिनेश के बेटे केदार कश्यप नारायणपुर से विधायक और कैबिनेट मंत्री भी हैं। विरासत: बलीराम कश्यप, दिनेश कश्यप (पूर्व सांसद), केदार कश्यप (चौथी बार मंत्री) अब कौन सक्रिय: केदार कश्यप (भाजपा नेता और मंत्री राजनीति में पूरी तरह सक्रिय)। दिनेश कश्यप (चुनावी राजनीति से अलग संगठन में सक्रिय) मौजूदा स्थिति: विधानसभा और बस्तर के आदिवासी इलाकों में अब भी प्रभावशाली, लेकिन बलीराम कश्यप जैसी पकड़ नहीं। कर्मा परिवार: बस्तर टाइगर की विरासत बस्तर टाइगर के नाम से मशहूर महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के फेस ऑफ बस्तर जाने जाते थे। 2013 में झीरम घाटी हमले में नक्सलियों ने उनकी हत्या कर दी। इसके बाद उनकी पत्नी देवती कर्मा विधायक बनी। इसके अलावा परिवार के अन्य सदस्य भी राजनीति में सक्रिय हैं। साल 2023 में कांग्रेस ने उनके बेटे छविन्द्र कर्मा को चुनाव लड़ाया है। लेकिन उन्हें हार मिली। विरासत: महेंद्र कर्मा (सलवा जुडूम नेता, 2013 झीरम हमले में शहीद) वर्तमान स्थिति: राजनीतिक प्रभाव: यह परिवार अब भी बस्तर क्षेत्र में कांग्रेस का प्रमुख चेहरा बना हुआ है। हालांकि, पूरे बस्तर क्षेत्र की जगह दंतेवाड़ा तक ही प्रभाव सीमित रह गया है। अग्रवाल परिवारः बिलासपुर की राजनीति में पकड़, जीत के बाद भी बिना ताज छत्तीसगढ़ की राजनीति में अग्रवाल परिवार का नाम सशक्त प्रतिनिधि के रूप में जाना जाता है। लखीराम अग्रवाल, जिन्हें भाजपा का पितृपुरुष कहा जाता है, उन्होंने उस दौर में पार्टी का झंडा उठाया जब समर्थक कम थे। उनके बेटे, अमर अग्रवाल, ने इस विरासत को आगे बढ़ाया और बिलासपुर से 5वीं बार विधायक चुने गए, जिनमें से तीन बार मंत्री पद संभाला। हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में जीत के बावजूद उन्हें मंत्री पद नहीं मिला, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं। विरासत: मौजूदा स्थिति: बिलासपुर और व्यापारिक वर्ग में अब भी अच्छी पकड़, लेकिन मंत्री पद न मिलने के बाद सियासी असर थोड़ा धीमा दिखा। जूदेव परिवार:’घर वापसी’ आंदोलन के प्रणेता जशपुर के जूदेव परिवार का प्रदेश की सियासत में अलग रुतबा रहा है और अपनी मूंछों पर ताव देने वाले दिलीप सिंह जूदेव की वजह से ही ये राज परिवार जाना जाता है। दिलीप सिंह जूदेव, जशपुर राजघराने के सदस्य, ‘घर वापसी’ आंदोलन के लिए प्रसिद्ध हैं। जूदेव सांसद और केंद्र में मंत्री भी रहे। इससे पहले उनके बेटे दिवंगत नेता युद्धवीर सिंह जूदेव दो बार विधायक रहे, जबकि इसी परिवार से रणविजय सिंह जूदेव राज्यसभा सांसद और युवा आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। साल 2023 में उनके छोटे बेटे प्रबल प्रताप कोटा विधानसभा और बहू संयोगिता जूदेव चंद्रपुर सीट से चुनाव लड़ी, लेकिन दोनों ही चुनाव नहीं जीत सके। विरासत: अब कौन सक्रिय: राजनीतिक प्रभाव: जशपुर और आसपास के क्षेत्रों में जूदेव परिवार की सामाजिक और सांस्कृतिक पकड़ अब भी मजबूत है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव में कमी आई है। नई पीढ़ी के सामने सियासी जमीन को फिर से मजबूत करने की चुनौती है। रमन सिंह परिवार: भाजपा का मजबूत स्तंभ छत्तीसगढ़ में 3 बार के मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह भले ही राजनीतिक परिवार से नहीं आते लेकिन रमन सिंह, 15 सालों तक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे और अब विधानसभा अध्यक्ष हैं। उनके बेटे, अभिषेक सिंह, एक बार सांसद रह चुके हैं। पिछले विधानसभा और लोकसभा दोनों ही चुनावों में चर्चा रही कि अभिषेक सिंह चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विरासत रमन सिंहः 15 साल मुख्यमंत्री रहे। वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष अब कौन सक्रिय: -रमन सिंह (विधानसभा उपाध्यक्ष, भाजपा के वरिष्ठ नेता)। -अभिषेक सिंह (पूर्व सांसद, फिलहाल चुनावी राजनीति से बाहर)। राजनीतिक प्रभाव: वर्तमान में, रमन सिंह छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष हैं और उनका प्रभाव अब भी पूरे छत्तीसगढ़ में है। पार्टी के निर्णयों में भी अहम भूमिका है, लेकिन अभिषेक सिंह सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर हैं, लेकिन पार्टी के कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति देखी जाती है। कुल मिलाकर नाम अब भी चलता है, लेकिन नई पीढ़ी को जगह नहीं मिल रही।
