सिंहदेव बोले-‘फूल छाप’ कांग्रेसियों को पहचानना जरूरी:बघेल पर कहा- उनके और मेरे संबंध ऐसे भी नहीं कि एक उत्तर देखे और दूसरा दक्षिण

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दैनिक भास्कर से खास बातचीत में छत्तीसगढ़ के पूर्व डिप्टी सीएम सिंहदेव ने कहा कि,पार्टी में फूल छाप कांग्रेसियों की पहचान करना जरूरी है। ऐसे लोग जो सिर्फ अवसर के हिसाब से सक्रिय होते हैं। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से संबंधों को लेकर सिंहदेव ने कहा कि, हमारे रिश्ते ऐसे नहीं कि एक उत्तर देखे और दूसरा दक्षिण। सिंहदेव ने प्रदेश अध्यक्ष की चर्चा, कांग्रेस संगठन में बदलाव और आगामी रणनीति को लेकर भी बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि मीडिया में कई नामों की चर्चा थी, जिसमें उनका नाम भी शामिल था, लेकिन संगठन का फैसला हाईकमान के हाथ में है। साथ ही, उन्होंने अपनी प्राथमिकता स्पष्ट करते हुए कहा कि फिलहाल उनका पूरा फोकस अंबिकापुर और सरगुजा संभाग में कांग्रेस को दोबारा मजबूत करने पर है। पढ़िए कांग्रेस की मौजूदा स्थिति, ED की कार्रवाई, अपनी भूमिका और भविष्य की रणनीति को लेकर रिपोर्टर देवव्रत भगत के सवाल और सिंहदेव के जवाब सवाल: छत्तीसगढ़ में कांग्रेस इन दिनों ED की कार्रवाई से घिरी हुई है। लखमा के बाद भूपेश बघेल भी रडार में हैं? जवाब: यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की इतनी उच्चस्तरीय संस्था की कार्यप्रणाली पर ही प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं। संस्थाओं का दुरुपयोग राजनीतिक हथियार की तरह होते हुए इतना देखा गया है कि अब निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगे हैं। जब भी ED जैसी एजेंसियां किसी पर कार्रवाई करती हैं, तो पहला सवाल यह नहीं उठता कि क्या किसी भ्रष्टाचार के आरोपी को पकड़ा गया, बल्कि यह उठता है कि फिर कोई राजनीतिक साजिश रची जा रही है। एक नागरिक के तौर पर मेरे मन में यही सवाल उठता है। सवाल: जब भूपेश बघेल के घर ED पहुंची, तो कई कांग्रेस नेताओं के आने से पहले ही भिलाई में आप पहुंचे? जवाब: ये संयोग था, मुझे दोपहर 12-1 बजे गंडई में एक कार्यक्रम में जाना था, लेकिन सुबह 9-10 बजे खबर मिली कि ED भूपेश बघेल के घर पहुंची है। उसी रास्ते से मुझे गंडई जाना था, इसलिए मैं पहले निकल पड़ा और वहां पहुंचा। कांग्रेस नेता राजेश तिवारी, अरुण वोरा और यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष आकाश तिवारी भी वहां थे। सवाल: छत्तीसगढ़ में तो सभी चुनाव हो चुके हैं फिर ये कार्रवाई, कौन सा राजनीतिक षड्यंत्र है? जवाब: भाजपा की परिकल्पना ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ थी। वे सिंगल-पार्टी शासन चाहते हैं, जैसा कि चीन और रूस में देखने को मिलता है। जहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन असल में लोकतंत्र सीमित ही रहता है। भारतीय लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की संभावना बनी रहती है, लेकिन भाजपा की मानसिकता हमेशा से एक-पार्टी शासन की रही है। सवाल: भाजपा कहती है कि कांग्रेस के भीतर ही कई गुट हैं, क्या सभी नेताओं की अलग कांग्रेस है? जवाब: मेरी कोई अलग कांग्रेस नहीं है, दीपक बैज, भूपेश बघेल, चरणदास महंत की कोई अलग कांग्रेस नहीं है। कांग्रेस एक ही है- अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी। हम सब उसी के प्रतिनिधि हैं। अगर कोई अपनी अलग कांग्रेस चलाता, तो वह खुद को पदाधिकारी बना लेता, लेकिन कांग्रेस में फैसले हाईकमान करता है, और वही लोकतांत्रिक तरीके से नेतृत्व तय करता है। सवाल: 2023 में कांग्रेस को हार का सामना क्यों करना पड़ा? जवाब: 2018 में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली थी। करीब 80% विधायक कांग्रेस के थे। हमने कई अच्छे काम किए, लेकिन कुछ कमजोरियां भी रहीं, जिससे ट्राइबल बेल्ट और शहरी क्षेत्रों में हम कमजोर पड़ गए। छत्तीसगढ़ की 90 सीटों में से बस्तर और सरगुजा की 26 सीटें और शहरी क्षेत्र की 20 सीटों में हमें बहुमत नहीं मिला। हालांकि मैदानी इलाकों में, जहां धान की खेती ज्यादा होती है, हमने 2018 में 27 सीटें जीती थीं, और इस बार 28 सीटें जीतीं। सवाल: कांग्रेस को अब किस तरह के सुधार करने चाहिए? जवाब: हमारा मुख्य लक्ष्य लोगों से जुड़े रहना और उनके विश्वास को बनाए रखना होना चाहिए। जहां हम कमजोर पड़े, वहां आत्ममंथन जरूरी है। सवाल: क्या इसके लिए नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत हो सकती है? जवाब: नेतृत्व परिवर्तन से ज्यादा जरूरी टीम वर्क है। एक क्रिकेट टीम में भी कप्तान बदलते रहते हैं, लेकिन असली मायने यह रखता है कि टीम कितनी संगठित है। सवाल: क्या कांग्रेस को अब आक्रामक होने की जरूरत है? जवाब: 2008 में मैं 1000 वोट से जीता था, तब किसी ने कहा था कि मुझे राजनीति सीखने जशपुर जाकर दिलीप सिंह जूदेव से ट्रेनिंग लेनी चाहिए, क्योंकि वे आक्रामक थे और मैं शांत स्वभाव का। मेरा स्वभाव नहीं बदला और 2013 और 2018 में मैंने और बड़े अंतर से चुनाव जीते। हालांकि 2023 में हार गया। क्या इसका मतलब यह है कि आक्रामक होना ही जीत की गारंटी है? मेरा मानना है कि स्वीकार्यता ज्यादा जरूरी है। सवाल: कभी ऐसा नहीं लगा कि आपको भी आक्रामक राजनीति करनी चाहिए? जवाब: अगर राजनीति में स्वीकार्यता गाली देने, कॉलर पकड़ने से मिलती, तो फिर मेरे जैसे व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं होगी। सवाल: पिछली सरकार में आपके शांत स्वभाव को लेकर कहा गया-“बाबा कब तक?” क्या तब राजनीति छोड़ने का विचार आया? जवाब: जब भी मुझे लगेगा कि मेरे स्वभाव के अनुरूप मैं जनता की सेवा नहीं कर पा रहा हूं, मैं राजनीति छोड़ दूंगा। राजनीति मानसिक और व्यक्तिगत त्याग मांगती है। मेरी वाइफ अब नहीं रहीं लेकिन 15 सालों तक मैं अपने परिवार को सिर्फ एक घंटे भी नहीं दे पाया। घर के सारे काम जैसे किताबें पढ़ना मेरा शौक है, नई जगह घुमना मुझे अच्छा लगता है। कई काम आदमी नहीं कर पाता। लेकिन यदि जनता मुझे स्वीकारती है, तो मैं अपना योगदान देता रहूंगा। सवाल: भूपेश बघेल और विष्णु देव साय की सरकारों में क्या अंतर महसूस करते हैं? जवाब: भूपेश सरकार ज्यादा अग्रेसिव थी, ये ज्यादा सबमिसिव है। सवाल: भूपेश सरकार की कौन-सी योजनाएं थीं, जिन्हें विष्णु सरकार को जारी रखना चाहिए था? जवाब: स्वामी आत्मानंद स्कूल योजना, हाट बाजार योजना और हेल्थ चेकअप योजना को यह सरकार जारी रख रही है, जो अच्छी बात है। लेकिन वन क्षेत्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की खरीदी बंद कर दी गई, जो गलत है। नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना भी बंद कर दी गई, जबकि यह पर्यावरण, जल संरक्षण और जैविक खेती के लिए बेहद जरूरी थी। इसके क्रियान्वयन में कोई कमी थी, तो उसे दूर किया जाना चाहिए था। सवाल: नई सरकार ने सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल खोलने का ऐलान किया जिसकी आपने सराहना की? जवाब: यदि किसी सरकार का कोई अच्छा कदम है, तो उसे धन्यवाद कहना व्यवहारिकता है, न कि तारीफ। तारीफ अलग चीज होती है। अगर आपने किसी चीज के लिए कहा और वो काम होता है, तो हर व्यक्ति धन्यवाद कहता है। मैंने अपने क्षेत्र के मेडिकल कॉलेज के लिए राशि की पहल की थी। वो राशि स्वीकृत हुई। तब मैंने कहा…धन्यवाद। अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज के लिए मैंने पहल की थी, अब 110 करोड़ की राशि स्वीकृत हुई है। सवाल: सियासी गलियारों में चर्चा थी कि टीएस सिंहदेव प्रदेश अध्यक्ष बन सकते हैं? जवाब: मीडिया में जिज्ञासा ज्यादा रहती है, आप लोगों ने तो मुझे मुख्यमंत्री भी बना दिया था। ओडिशा, यूपी, हिमाचल में कांग्रेस कमेटी भंग हुई, तब चर्चा छत्तीसगढ़ तक आई। अगर यहां ऐसा हुआ तो कौन अध्यक्ष बनेगा, इसमें कई नाम थे, मेरा भी। कुछ ने खुद के लिए भी दावा किया। सवाल: अगर ये जिम्मेदारी मिलती है, तो क्या आप इसके लिए तैयार हैं? जवाब: क्यों नहीं? सवाल: भूपेश बघेल को पंजाब भेजा गया, क्या कहेंगे? जवाब: उन्हें “भेजा” नहीं गया। उनकी क्षमता और अनुभव का पार्टी उपयोग कर रही है। वह पांच साल मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री रहे हैं। पार्टी उन्हें सिर्फ विधायक के तौर पर नहीं रख सकती थी। ऐसे नेताओं को पार्टी के लिए एसेट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सवाल: पार्टी के लिए एसेट्स तो आप भी हैं? जवाब: बिल्कुल, और आगे कोई नई जिम्मेदारी भी मिल सकती है। फिलहाल, पार्टी ने मुझे सेंट्रल इलेक्शन कमेटी में रखा है, जो टिकटों के फैसले लेती है, यह बड़ी जिम्मेदारी है। मेनिफेस्टो कमेटी में भी चार राज्यों के चुनाव की जिम्मेदारी मिली थी। अगर मैं खुद अपनी ज़मीन मजबूत नहीं कर सका, तो बाकी जगहों पर भागने का क्या मतलब? मुझे वहीं ध्यान देना चाहिए, जहां मैं पार्टी को सबसे ज्यादा मदद कर सकता हूं। उसके बाद ही यह देखा जाएगा कि मेरा अगला योगदान पार्टी के लिए क्या हो सकता है। सवाल: 2018 के चुनाव से पहले आपकी और भूपेश बघेल की ‘जय-वीरू’ जैसी दोस्ती चर्चा में थी। जब फिर से विपक्ष में हैं, तो क्या वही अंडरस्टैंडिंग और तेवर देखने को मिलेंगे? जवाब: पार्टी के हित में काम करने की प्रतिबद्धता पहले जैसी ही है। हां, इस दौरान कुछ परिस्थितियां ऐसी रही हैं, जिनकी वजह से चीजें थोड़ी बदली हैं। अगर मैं ये कहूं कि कहीं कुछ भी नहीं है और आप इसे पब्लिश कर दें, तो लोग मुझ पर ही हंसेंगे। राजनीति में भी परिपक्वता (maturity) आती है, और विपरीत परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। कभी-कभी आपसी संबंधों में तनाव भी आ जाता है। पति-पत्नी और पिता-बेटे में भी मतभेद होते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हर बार घर छोड़कर चले जाएं। हम चीजों को ठीक करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा, “अच्छा लगा कि आप आए। तब मैंने कहा कि ,कभी कोई तकलीफ या समस्या हो, तो जरूर बताइएगा।” यह व्यक्तिगत संवाद है, जिसे सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन आपने पूछा, तो मैंने बता दिया। हमारे संबंध ऐसे नहीं हैं कि एक उत्तर दिशा देखे और दूसरा दक्षिण। जिस कांग्रेस के ‘घर’ में हम हैं, वहां सफलता के लक्ष्य को पाने के लिए हमें एकजुट होकर काम करना होगा। सवाल: राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि कांग्रेस में कई नेता बीजेपी के लिए काम करते हैं। क्या छत्तीसगढ़ कांग्रेस में भी ऐसे लोग हैं? जवाब: ऐसे लोगों की पहचान जरूरी है। यह कोई नई बात नहीं है, ऐसी चर्चाएं हमेशा होती हैं। साधारण भाषा में कहें, तो कुछ लोग “फूल छाप कांग्रेसी” होते हैं यानी जहां सत्ता होती है, वे उसी ओर चले जाते हैं। अगर सत्ता बदले, तो वे फिर पाला बदल लेते हैं। ऐसे लोगों को पहचान कर ही पार्टी को जिम्मेदारी देनी चाहिए। उनसे दुआ-सलाम रखना अलग बात है, लेकिन अगर पार्टी को जीत की ओर ले जाना है, तो दो नावों में पांव रखने वालों को जिम्मेदारी देने से बचना होगा।

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