स्टार बनने के बाद चॉल में रहे जैकी:सक्सेस के बाद दिवालिया हुए, दोगुनी मेहनत से कर्ज उतारा, पिता की मौत के बाद शूटिंग की

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बॉलीवुड के ‘जग्गू दादा’ के नाम से मशहूर जैकी श्रॉफ की कहानी संघर्ष, दृढ़ता और स्मार्ट निवेश का एक शानदार उदाहरण है। मुंबई के तीन बत्ती इलाके की चॉल में जन्मे जैकी ने जिंदगी के हर मोड़ पर चुनौतियों का सामना किया, लेकिन हार नहीं मानी। ‘हीरो’ की रिलीज के बाद भी जैकी श्रॉफ पांच-छह साल तक उसी चॉल में रहे। आज भले ही वे लग्जूरियस लाइफस्टाइल जीते हों, लेकिन उनका सफर आम आदमी से सुपरस्टार बनने की प्रेरणादायक दास्तान है। आज की सक्सेस स्टोरी में जानेंगे जैकी श्रॉफ के जीवन और करियर से जुड़े कुछ रोचक किस्से.. मूंगफली बेचकर परिवार का सहारा बने जैकी श्रॉफ ने अपने परिवार के साथ मुंबई की तीन बत्ती चॉल के एक छोटे से कमरे में 33 साल बिताए। सात छोटी-छोटी बिल्डिंग्स में सभी लोगों के लिए सिर्फ तीन बाथरूम थे। हर सुबह शौचालय के बाहर लंबी लाइन लगती थी। जैकी को भी हाथ में मग लेकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वे जमीन पर बैठकर खाना खाते और फर्श पर ही सोते थे। एक बार फर्श पर सोते समय चूहे ने उन्हें काट लिया था और उनकी मां को भी चूहे ने काटा था। कभी-कभी कमरे में सांप भी दिख जाता था। घर की माली हालत इतनी खराब थी कि जैकी को 11वीं क्लास के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। परिवार का सहारा बनने के लिए उन्होंने मूंगफली बेचने से लेकर तरह-तरह के छोटे-मोटे काम किए। नौकरी की तलाश में भटक रहे थे, मिला मॉडलिंग का ऑफर स्ट्रगल के दिनों में जैकी मुंबई के एक बस स्टैंड पर खड़े थे, नौकरी की तलाश चल रही थी और घर की हालत अच्छी नहीं थी। तभी एक मॉडलिंग कंपनी के अकाउंटेंट ने उन्हें मॉडल बनने का ऑफर दिया। आर्थिक तंगी के कारण जैकी ने यह ऑफर स्वीकार कर लिया। मॉडलिंग करते हुए उन्होंने एक्टिंग सीखने के लिए एक इंस्टीट्यूट जॉइन किया, जहां उनकी मुलाकात देव आनंद के बेटे सुनील आनंद से हुई। जैकी के फिजिकल एट्रिब्यूट्स और एक्टिंग स्किल्स से प्रभावित होकर सुनील ने उन्हें अपने पिता के पास भेजा। 1982 में देव आनंद ने उन्हें एक फिल्म ‘स्वामी दादा’ में छोटा रोल दिया, लेकिन असली ब्रेक थ्रू 1983 में सुभाष घई की फिल्म ‘हीरो’ से मिला। फिल्में हिट, फिर भी चॉल में रहे ‘हीरो’ की रिलीज के बाद भी जैकी श्रॉफ पांच-छह साल तक मुंबई के तीन बत्ती चॉल में रहे। स्टार बनने के बावजूद उन्होंने कई साल तक अपना पुराना घर नहीं छोड़ा। जैकी ने खुद बताया कि वे 33 साल तक चॉल में रहे और यहां तक कि उनकी कुछ हिट फिल्में आने के बाद भी वे वहीं रहते रहे। इतना ही नहीं, 1987 में आयशा से शादी के बाद भी जैकी उसी चॉल में पत्नी के साथ रहे। बड़ा घर, लेकिन परिवार से दूरियां बाद में जैकी श्रॉफ ने बांद्रा के कार्टर रोड पर किराए का एक मकान लिया। इसके बाद उन्होंने खार वेस्ट में आठ बेडरूम वाला आलीशान घर बनाया और अपने परिवार के साथ वहां शिफ्ट हो गए। आज वे पाली हिल जैसे शानदार इलाके में बने बंगले में रहते हैं। जैकी अक्सर कहते हैं कि जब वे छोटे से कमरे और चॉल वाली जिंदगी से निकलकर बड़े घर में शिफ्ट हुए, तो उसी के साथ परिवार में दूरी भी बढ़ गई। बड़े घर में शिफ्ट होने के बाद हर किसी का अपना कमरा, अपना कोना और अपनी प्राइवेसी हो गई, जिससे साथ बैठने और बात करने का समय कम होता गया। फिल्मी अंदाज में हुआ था आयशा से प्यार जैकी और आयशा की प्रेम कहानी किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है। आयशा को जैकी ने पहली बार बस में देखा था। उस समय वह 14-15 साल की थीं। जैकी उस बस के पीछे एक दोस्त की बाइक चला रहे थे। आयशा एक मार्च पास्ट से आ रही थीं और बस में हैंडल पकड़कर झंडा लिए खड़ी थीं। जैकी ने उसी वक्त खुद से कहा कि इसी लड़की से शादी करेंगे। आयशा के बस से उतरने के बाद जैकी उनसे मिले और दोनों ने थोड़ी देर बात की। कुछ दिनों बाद आयशा की एक दोस्त ने जैकी से कॉन्टैक्ट किया और बताया कि आयशा को लगता है कि उनको एक्टिंग पर विचार करना चाहिए। उसने फिल्मकार ओपी रलहन द्वारा आयोजित किए जा रहे एक ऑडिशन के बारे में भी बताया। जैकी कहते हैं- मुझे रोल नहीं मिला, लेकिन मैं आयशा के प्यार में पड़ गया। बहरहाल, ‘हीरो’ के बाद जैकी श्रॉफ की ‘तेरी मेहरबानियां’, ‘कुदरत का कानून’, ‘कर्मा’, ‘त्रिदेव’, ‘राम लखन’ ‘परिंदा’ जैसी कई फिल्में हिट रहीं। ‘परिंदा’ में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। बाद में ‘1942: ए लव स्टोरी’ और ‘रंगीला’ (1996) के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवॉर्ड से नवाजा गया । दिवालिया होने के बाद भी हार नहीं माने सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी जैकी के जीवन में एक ऐसा दौर आया जब वे पूरी तरह से दिवालिया हो गए। 2003 में आयशा श्रॉफ ने ‘बूम’ नाम की एक ब्लैक कॉमेडी फिल्म प्रोड्यूस की, जिसमें अमिताभ बच्चन, जैकी श्रॉफ, गुलशन ग्रोवर, कैटरीना कैफ और जीनत अमान जैसे सितारे थे। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई और श्रॉफ परिवार पर भारी कर्ज हो गया।​ इस कर्ज को चुकाने के लिए जैकी को अपना घर और फर्नीचर तक बेचना पड़ा। जैकी ने हार नहीं मानी और दोगुनी मेहनत से काम करना शुरू किया और सभी कर्जदारों को पैसा लौटाया। उन्होंने अपने बच्चों टाइगर और कृष्णा को इस आर्थिक संकट से दूर रखा और उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ने दिया। जैकी कहते हैं- भाई और मां-बाप के जाने के बाद मैं टूट गया था। पिताजी का निधन हुआ, मगर अगले दिन शूटिंग पर जाना पड़ा। लोग खड़े थे, पूरी यूनिट इंतजार कर रही थी, तो अपना गम अपने पास रखकर, वहां जाकर काम किया। यही जिंदगी है। स्मार्ट निवेश से नुकसान की भरपाई की जैकी श्रॉफ की सबसे बड़ी कामयाबी उनके एक स्मार्ट निवेश की देन है। 1995 में जब सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन भारत में लॉन्च हो रहा था, तब जैकी ने इसमें निवेश करने का फैसला किया। यह निवेश इतना सफल रहा कि 15 साल बाद उनका रिटर्न प्रति एक लाख रुपए पर 100 करोड़ रुपए हो गया। इस निवेश से मिले रिटर्न ने ‘बूम’ की विफलता से हुए सारे नुकसान की भरपाई कर दी। 15 साल बाद उन्होंने अपने शेयर बेच दिए और सोनी के साथ उनका रिश्ता खत्म हो गया। सफलता वह जिससे आने वाली पीढ़ी को फायदा हो अपनी सक्सेस पर बात करते हुए जैकी श्रॉफ कहते हैं- मेरे लिए सफलता यही है कि कोई आपकी बात सुने और आपकी सफलता को लेकर कोई अच्छा काम करे। मतलब सफलता वह है कि आप आने वाली पीढ़ी को फायदा पहुंचा सकें। उन्हें वो चीजें देकर जो हम खत्म कर रहे हैं। यही सफलता है कि एक बाप अपने बेटे के लिए और उसके बेटे के बेटे के लिए कुछ ऐसी चीजें छोड़कर जा सके, जो आने वाली पीढ़ियों के काम आए।​ उसे सफलता कहते हैं। सफलता सिर्फ पैसा कमाना या नाम कमाना नहीं है। अगर तुमने अच्छी सब्जी उगाई और उस मिट्टी को संभाला, तो वो भी सफलता है। मैंने इस मिट्टी को 30 साल से संभालकर रखा है, जो आगे चलकर दिखेगी। तो उसे सफलता कहते हैं, किसी चीज को छोड़कर जाने की ताकत, जो उन्हें और बढ़ने में मदद करे।​ पैसा कमाना, नाम कमाना, दौलत, वह सब तो है ही, लेकिन हम तो छोटे लोग हैं, असली बड़े तो वो बादशाह लोग हैं जिनके पास महल हैं। खुश रहो, मगर देकर क्या जा रहे हो गुरु? यही सफलता है। अगर मैं कुछ बोलूं और कोई उस बात को उठाकर उस पर अमल करे, वो मेरे लिए सफलता है। मान लो मैंने कहा, पेड़ लगा बेटा!’ और तुमने एक की जगह 10 लगा दिए, तो वो सफलता है। जैकी ने अपनी 25वीं शादी की सालगिरह के मौके पर मुंबई और पुणे के बीच 44,000 वर्ग फुट का एक शानदार फार्महाउस खरीदा। यह फार्महाउस हरियाली से भरा है, जिसमें 700 से ज्यादा पौधे, स्विमिंग पूल, फिश पॉन्ड, अखाड़ा स्टाइल का जिम और एक टाइटैनिक पॉइंट भी है।​ मां की याद में लगाया था पेड़ आज भी जैकी श्रॉफ अपने लुक और स्टाइल के लिए जाने जाते हैं, लेकिन वे अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं। अपने फार्महाउस में वे ऑर्गेनिक खेती करते हैं और पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाते हैं। उन्होंने अपनी मां की याद में 12 साल पहले एक पेड़ लगाया था, जो आज भी फार्महाउस में मौजूद है।​ सस्ते खादी भंडार के कपड़े पहने, बना अलग स्टाइल अपने लुक और स्टाइल के बारे में बात करते हुए जैकी कहते हैं- जब मैं चॉल में रहता था तब खादी भंडार से 5-7 रुपए मीटर वाला कपड़ा लेता था। जो परदों जैसा, अजीब-सा मटेरियल होता था, वही काटकर शर्ट बना लेता था। मुझे ऑड चीजें बहुत पसंद थीं, क्योंकि सड़क पर चलते वक्त जब कुत्ते ‘वूफ-वूफ’ करके सिर्फ मुझे देखकर भौंकते थे न, तो लगता था। हां, मैं अलग दिख रहा हूं। सब पर नहीं चिल्ला रहे, मेरे पर चिल्ला रहे हैं। तो ऐसे-ऐसे कपड़े पहनते-पहनते, मैं खुद ही अलग बन गया।” ____________________________________________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़िए… राकेश बेदी को जान से मारने की धमकियां मिली थीं:‘धुरंधर’ से बदली इमेज, बोले- ऐसा मौका पहले नहीं मिला, थिएटर ने मुझे रेलेवेंट रखा राकेश बेदी अपनी हालिया रिलीज फिल्म ‘धुरंधर’में पाकिस्तानी राजनेता जमील खान के किरदार में नजर आए हैं। ज्यादातर फिल्मों में कॉमिक किरदार निभा चुके एक्टर को इस फिल्म से एक अलग पहचान मिली है। इस फिल्म से पहले राकेश बेदी की ‘चश्मे बद्दूर’, ‘एक दूजे के लिए’ जैसी कई फिल्में चर्चा में रही हैं।पूरी खबर पढ़ें….

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