‘जीतू अगर मुझसे एक्टिंग सीखता, तो जरूर खराब करता’:अरशद वारसी बोले जीतू टैलेंटेड है; जीतेंद्र कुमार ने फिल्म भागवत को अपने करियर का सबसे अलग रोल बताया

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जब एक फिल्म में दमदार कहानी, मजबूत किरदार और सामाजिक सरोकार आपस में जुड़ते हैं, तो कलाकारों को भी उससे जुड़ने का एक गहरा कारण मिल जाता है। फिल्म ‘भागवत चैप्टर 1: राक्षस’ मानव तस्करी जैसे गंभीर विषय को हल्के-फुल्के कॉमर्शियल अंदाज में पेश करती है, उसी पर एक्टर अरशद वारसी और जीतेंद्र कुमार ने खुलकर बातचीत की है। फिल्म में जहां अरशद एक इन्टेंस लेकिन दिलचस्प पुलिस ऑफिसर के किरदार में नजर आने वाले हैं, वहीं जीतेंद्र एक बिल्कुल अलग अवतार में दर्शकों को चौंकाने वाले हैं। इस बातचीत में दोनों कलाकार फिल्म से अपने जुड़ाव, किरदारों की तैयारी और अपने-अपने सफर के बारे में बात की हैं। एक एक्टर के तौर पर आप इस फिल्म से कैसे जुड़े? ऐसा क्या था जो आपको इस प्रोजेक्ट की तरफ खींच लाया? अरशद वारसी- मैंने सबसे पहले हमारे डायरेक्टर अक्षय शेरे से स्क्रिप्ट सुनी। कहानी मुझे काफी मजेदार और इंटेंस लगी। स्क्रीनप्ले और कॉन्सेप्ट बहुत मजबूत था। जिस तरह से कहानी बुनी गई थी, उसमें दिलचस्पी जागी। काफी वक्त बाद मुझे एक ऐसा रोल मिला जिसमें मैं ऑफिसर की वर्दी पहन रहा हूं। इससे पहले मैंने ‘सहर’ फिल्म में एसएसपी अजय कुमार का रोल निभाया था। मेरा बस चले तो ऐसी ही एक वर्दी घर में बनवाकर रख लूं और पहनकर काम पर जाऊं। यह रोल लाइट कॉमेडी और कॉमर्शियल स्पेस में है लेकिन साथ ही थोड़ा इंटेंस भी है। जीतेंद्र कुमार- इस फिल्म के डायलॉग राइटर सुमित सक्सेना मेरे अच्छे दोस्त हैं। हम पहले एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे जो हो नहीं पाया। फिर एक दिन उनका कॉल आया और उन्होंने कहा कि एक फिल्म है, कहानी सुननी है। मैं गया, डायरेक्टर से मिला और कहानी सुनकर तुरंत ‘हां’ कर दी। जो भी किरदार मैंने अब तक निभाए हैं, यह उन सबसे बिल्कुल अलग था। यही वजह थी कि मैं इस फिल्म को लेकर बहुत एक्साइटेड था। मुझे मेरे और कॉप के बीच की केमेस्ट्री बहुत दिलचस्प लगी। इस किरदार के लिए मैंने करीब 5-6 दिन स्क्रिप्ट पढ़ी, टीम के साथ डिस्कशन किए और फिर जाकर परफॉर्म किया। अरशद, आपके किरदार के अंदर एक आंतरिक संघर्ष चलता है जो फिल्म में नजर आता है। क्या इसके लिए आपने कोई खास तैयारी की? अरशद वारसी- सच कहूं तो मैंने इसके लिए कोई अलग रिसर्च या खास तैयारी नहीं की। मैं क्यों झूठ बोलूं कि मैं तीन महीने वनवास में चला गया था। जब मैंने कहानी सुनी, तो बस 24 घंटे उस किरदार के बारे में सोचता रहा। फिर फिल्म के राइटर और डायरेक्टर के साथ बातचीत होती रही कि वो मुझसे क्या चाहते हैं और मैं उस किरदार को कैसे जस्टिफाई करूं। उनसे इनपुट मिलते थे, जिसकी मदद से मैं अपने दिमाग में उस आदमी की एक छवि बना लेता था कि वो ऐसा होगा। फिल्म मानव तस्करी पर आधारित है, क्या शूट से पहले आपने इसके लिए कोई रिसर्च की? अरशद वारसी- देखिए, मेरा मानना है कि फिल्म किसी भी विषय पर हो, एक कलाकार को फिल्म के नजदीक रहना चाहिए। जो कहानी राइटर ने लिखी है, वही आपकी जानकारी होनी चाहिए। वरना आप फिल्म की सोच से भटक सकते हैं। साथ ही, हमारे राइटर और डायरेक्टर पहले से ही विषय पर गहरी रिसर्च कर चुके थे, तो मुझे अलग से रिसर्च की जरूरत नहीं पड़ी। जीतेंद्र कुमार- मैंने डायरेक्टर से पूछा था कि मुझे अपनी ओर से कुछ रिसर्च करनी चाहिए क्या? लेकिन उन्होंने मना कर दिया। बस जितनी ब्रीफिंग मिलती गई, उसी के आधार पर मैंने काम किया। क्या आपको लगता है कि फिल्म दर्शकों के दिलों में अपनी छाप छोड़ पाएगी? जब लोग फिल्म देखें तो उन्हें क्या महसूस होना चाहिए? अरशद वारसी- हर फिल्म किसी न किसी जज्बात को छूती है। मुझे उम्मीद है कि इस फिल्म में भी कुछ ऐसी बातें होंगी जो दर्शकों के दिल तक पहुंचेगी। जो हालात हमने फिल्म में दिखाए हैं, वो उनके जेहन में रहें। लोग समझें कि हमने क्या दिखाने की कोशिश की है। और सबसे बड़ी बात, उन्हें यह महसूस हो कि उनका समय बेकार नहीं गया। जीतेंद्र कुमार- मुझे लगता है जब दर्शक फिल्म के हर मोमेंट और हर किरदार को महसूस कर सकें, तो वही हमारी जीत है। अगर वो रियलाइजेशन स्क्रीन से दर्शकों तक ट्रांसलेट हो पाए, तो एक आर्टिस्ट के तौर पर यही सबसे बड़ी सफलता होगी। मुझे लगता है कि फिल्म में आयशा का किरदार जरूर लोगों को इंस्पायर करेगा। आप दोनों ही नॉन-फिल्मी बैकग्राउंड से आते हैं। साथ में काम करते वक्त क्या आपने अपनी जर्नी के संघर्षों में कुछ समानता देखी? अरशद वारसी- मुझे तो लगता है कि हम दोनों ही बहुत रेगुलर लोग हैं, लेकिन बहुत टैलेंटेड हैं। जीतेंद्र बहुत अच्छा एक्टर है। अगर ऐसा नहीं होता तो फिल्म का सारा भार मुझ पर आ जाता और इसकी एक्टिंग भी मुझे ही करनी पड़ती। अगर कभी इसने मुझसे एक्टिंग सीख ली होती, तो शायद और भी खराब परफॉर्म करता।

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