आसियान समिट में मोदी-ट्रम्प की मुलाकात नहीं होगी:PM मलेशिया नहीं जाएंगे, कांग्रेस बोली- ट्रम्प से मिलने से बचना चाहते हैं भारतीय पीएम

0
106

आसियान समिट में मोदी-ट्रम्प की मुलाकात नहीं होगी। PM मोदी का मलेशिया दौरा टल गया है। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने एक्स पर पोस्ट कर इसकी जानकारी दी। पीएम इब्राहिम ने लिखा- आज पीएम मोदी का फोन आया। हमने भारत-मलेशिया के संबंधों को और मजबूत करने पर चर्चा की। हमने इस दौरान आसियान समिट पर भी बात की। मोदी ने मुझे बताया कि वे इस समिट में ऑनलाइन हिस्सा लेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के मलेशिया न जाने के फैसले पर कांग्रेस ने गुरुवार को दावा किया कि इसके पीछे की वजह डोनाल्ड ट्रम्प हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर लिखा कि मोदी ट्रम्प के सामने घिरना नहीं चाहते रमेश बोले- सोशल मीडिया पर तारीफ करने और मिलने में फर्क रमेश ने लिखा- पिछले कई दिनों से अटकलें चल रही थीं कि प्रधानमंत्री मोदी कुआलालंपुर सम्मेलन में जाएंगे या नहीं? अब यह लगभग तय हो गया है कि प्रधानमंत्री वहां नहीं जाएंगे। इसका मतलब है कि कई विश्व नेताओं से गले मिलने, फोटो खिंचवाने और खुद को विश्वगुरु बताने के कई मौके हाथ से निकल गए। पीएम मोदी के वहां नहीं जाने की वजह साफ है- वे राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने नहीं आना चाहते, जो वहां मौजूद होंगे। उन्होंने कुछ हफ्ते पहले मिस्र में गाजा शांति शिखर सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण भी इसी वजह से ठुकरा दिया था। रमेश ने आगे लिखा- सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति ट्रम्प की तारीफ में पोस्ट करना एक बात है, लेकिन उस व्यक्ति के साथ आमने-सामने होना, जिसने 53 बार ऑपरेशन सिंदूर रोकने का दावा किया है और 5 बार यह कहा है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद करने का वादा किया है – यह दूसरी बात है। यह उनके लिए काफी जोखिम भरा है। प्रधानमंत्री शायद अब उस पुराने हिट बॉलीवुड गाने को याद कर रहे होंगे: बच के रहना रे बाबा, बच के रहना। पहली बार आसियान समिट में हिस्सा लेने नहीं जाएंगे मोदी पीएम बनने के बाद से मोदी अब तक 12 बार आसियान समिट में शामिल हो चुके हैं। 2020 और 2021 में दो साल तक आसियान समिट का आयोजन वर्चुअल हुआ था। तब मोदी इसमें ऑनलाइन शामिल हुए थे। यह पहली बार होगा जब मोदी आसियान समिट में हिस्सा लेने नहीं जाएंगे। आसियान समिट 26 से 28 अक्टूबर तक कुआलालंपुर में आयोजित किया जाएगा। समिट से संबंधित विचार-विमर्श में भारत की भागीदारी के स्तर पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। मलेशिया ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ-साथ आसियान के कई साझेदार देशों के नेताओं को भी आमंत्रित किया है। ट्रम्प 26 अक्टूबर को दो दिवसीय यात्रा पर कुआलालंपुर जाएंगे। 10 देशों का समूह है आसियान आसियान की स्थापना 1967 में बैंकॉक में हुई थी। यह दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का एक क्षेत्रीय संगठन है। इसका पूरा नाम एसोसिएशन ऑफ साउथ-ईस्ट एशियन नेशन्स (ASEAN) है। इसमें कुल 10 सदस्य देश हैं, जिनमें इंडोनेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, म्यांमार, कंबोडिया, ब्रुनेई और लाओस शामिल हैं। भारत ने 2022 में आसियान देशों के साथ कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप (CSP) साइन की थी। इसके तहत रक्षा, आर्थिक और तकनीकी हितों को बढ़ाने के लिए मिलकर काम किया जाता है। वहीं, इस इलाके में चीन को काउंटर करने के लिए भारत आसियान देशों के साथ संबंधों को मजबूत कर रहा है। अमेरिका-रूस की दुश्मनी के बीच बना आसियान 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद साउथ ईस्ट एशिया के देशों को जापान और पश्चिमी देशों के कब्जे से आजादी मिली। उनकी जापान से तो जंग खत्म हो गई, लेकिन वो विचारधारा और सीमा विवाद को लेकर आपस में ही लड़ने लगे। ये दौर अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच चल रहे शीत युद्ध का भी था। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज में आसियान मामलों के जानकार निरंजन ओक बताते हैं- 1965 में इंडोनेशिया में हुए तख्तापलट में चीन के समर्थन वाली सुकर्णो सरकार गिर गई। इसके बाद 1966 में मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच चल रहा युद्ध भी खत्म हो गया। हालांकि वियतनाम में अभी भी कम्युनिस्टों के खिलाफ अमेरिका की जंग जारी थी। तभी 1967 में साउथ ईस्ट एशिया के 5 देश आपसी दुश्मनी भूलकर बैंकॉक में मिले। इनमें मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड शामिल थे। इन देशों ने तय किया कि ये कम्युनिज्म यानी वामपंथ विचारधारा के विस्तार को रोकेंगे और इलाके की शांति और समृद्धि के लिए काम करेंगे। ये ASEAN यानी एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस की नींव पड़ने की शुरुआत थी। 1990 के दशक में शीत युद्ध खत्म होने के बाद इस संगठन में 5 नए देश कंबोडिया, वियतनाम, ब्रुनेई, लाओस और म्यांमार भी शामिल हो गए। इन देशों ने एक-दूसरे से आर्थिक साझेदारी बढ़ाने का फैसला किया, ताकि किसी भी तरह का विवाद होने के बावजूद उनमें जंग न हो। अब आसियान में 10 देश शामिल हैं। 15 साल पहले भारत-आसियान देशों के बीच FTA भारत और आसियान देशों के बीच रिश्ते की शुरुआत 1990 के दशक से होती है। जब 1992 में नरसिम्हा राव की सरकार ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी शुरू की। इस पर ब्रिटिश मैगजीन द इकोनॉमिस्ट ने 6 मार्च 1997 को एक रिपोर्ट छापी। इसमें लिखा गया कि नेहरू ने हमेशा साउथ ईस्ट एशिया के देशों को पश्चिमी देशों का पिछलग्गू समझा जो अब भारत के लिए आर्थिक मॉडल बनकर उभर रहे हैं। इकोनॉमिस्ट ने लिखा कि भारत आसियान देशों के नक्शे कदम पर चलकर अपनी अर्थव्यवस्था को सुधार रहा है। दरअसल, आपसी मतभेद खत्म होने के बाद आसियान देशों ने तेजी से आर्थिक विकास करना शुरू कर दिया। आसियान तेजी से उभरने वाली विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का समूह बन गया, जिससे सब देश जुड़ना चाहते थे। सिंगापुर की प्रति व्यक्ति आय कई विकसित देशों के मुकाबले काफी बेहतर है। 2010 में लगभग 6 साल तक की गई बैठकों के बाद भारत ने आसियान देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किया। 2014 में जब BJP की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की लुक ईस्ट पॉलिसी को अपग्रेड कर इसे एक्ट ईस्ट पॉलिसी में बदल दिया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here