एक्ट्रेस इंदिरा कृष्णन की हालिया रिलीज फिल्म ‘जटाधरा’ है। इसके अलावा वह टीवी शो ‘गंगा माई की बेटियां’ में ठकुराइन दुर्गावती के दमदार किरदार में दिख रही हैं। आगे वह ‘रामायणम्’ में कौशल्या की भूमिका में दिखेंगी। ‘रामायणम्’ की खास बात यह है कि इस फिल्म के लिए बिना ऑडिशन दिए ही सलेक्ट हो गईं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत के दौरान एक्ट्रेस ने बताया कि उन्हें ‘दृश्यम’ और ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों के सशक्त रोल अधिक सूट करते हैं। पेश है इंदिरा कृष्णन से हुई बातचीत के कुछ और अंश.. ‘गंगा माई की बेटियां’ में आपके किरदार ‘ठकुराइन दुर्गावती’ की क्या खासियत है? दुर्गावती का किरदार पूरे शो में सबसे ज्यादा शेड्स वाला है। यह किरदार केवल नेगेटिव नहीं है, इसमें इमोशनल शेड्स भी हैं, गुस्सा है, एक जिद है, और यह अपनी बात पर एकदम जस्टिस करने वाली है, भले ही वह 110 लाइन की बात को एक लाइन में बोल दे। यह एक बहुत ही वजनदार रोल है। मैं इसे पूरी तरह नेगेटिव नहीं कहूंगी, पर हां, एक मां कभी-कभी स्वार्थी भी हो जाती है, कहीं-कहीं उसे दर्द भी होता है और यह सब शायद आगे शो में आएगा। यह किरदार बहुत शानदार है। इस शो का फील अलग है और इसमें एक नयापन है। ‘गंगा माई….’ में एक साथ तीन-चार कहानियां चल रही हैं और हर किरदार दूसरे किरदार से इंटरलिंक है। यह शो एक बहुत हिट कन्नड़ शो ‘पुट्टक्कना मक्कलु’ का रीमेक है, जो दर्शकों को एक फ्रेशनेस दे रहा है। दुर्गावती के किरदार के लिए कोई प्रेरणा ली या कुछ हद तक वैसी ही शख्सियत हैं? दुर्गावती के किरदार में बहुत गहराई है। वह अपने बेटे को बहुत चाहती है। उसके अपने सिद्धांत हैं। वह गांव की मुखिया (पंचायत की हेड) भी है। यह किरदार दिखाता है कि एक औरत कैसे घर और बाहर दोनों को अच्छे से संभालती है। मुझे लगता है कि किसी शो में इतने शेड्स किसी और किरदार को नहीं मिले हैं। हां, मैं असल जिंदगी में भी थोड़ी बोल्ड हूं। अगर मुझे कोई इंसान या बात पसंद नहीं आती, तो मैं उसे सामने से समझाती हूं। मैं पीठ पीछे कभी बात नहीं करती। मेरे कुछ अनुशासन और सिद्धांत हैं और शायद इसी वजह से मुझे इंडस्ट्री में 24 साल की कंसिस्टेंसी मिली है। मुझे लगता है, आजकल इंडस्ट्री के लोग डिसिप्लिन और प्रिंसिपल भूल गए हैं। आज इंडस्ट्री में कलाकारों में आपको किस चीज की कमी दिखती है? आजकल के एक्टर्स में मैंने देखा है कि वे सिर्फ अपनी लाइनें या डायलॉग्स पढ़ते हैं, पूरा सीन नहीं पढ़ते। इसकी वजह से किरदार उभर कर नहीं आता। अगर आप पूरा सीन पढ़कर परफॉर्म करते हैं, तो वह किरदार पूरी तरह जीवंत हो उठता है और आप बेहतर इंटरैक्शन कर सकते हैं। यह मैंने अपने सीनियर एक्टर्स और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के लोगों से सीखा है। मैं खुद भी पूरा सीन पढ़े बिना काम नहीं करती, भले ही मेरी कोई लाइन न हो। एक एक्टर को क्रिएटिवली इन्वॉल्व होना चाहिए और थोड़ी छूट मिलनी चाहिए ताकि वह अपने किरदार को एक अलग मुकाम पर ले जाए। ‘रामायणम्’ में कौशल्या का रोल आपको कैसे मिला? इससे पहले ‘एनिमल’ में मैंने रश्मिका मंदाना की मां का छोटा-सा रोल किया था। ‘रामायणम्’ में मैंने रणबीर के साथ कौशल्या का किरदार निभाया है। मेरा रास्ता ‘एनिमल’ फिल्म से ही खुला था। मैं जब रणबीर कपूर से मिली तो उन्होंने भी खुशी जताई कि मैं यह रोल कर रही हूं। मैंने कोई ऑडिशन नहीं दिया था। मेकर्स ने मुझे देखकर ही बोला था कि उन्हें इंदिरा जी ही चाहिए। मैंने केवल लुक टेस्ट दिया था, जिसमें मैं कौशल्या के रूप में एकदम परफेक्ट लगी। डायरेक्टर नितेश तिवारी जी का विजन और डायरेक्शन सेंस बहुत बढ़िया है, जिसकी वजह से मैंने यह किरदार बहुत स्मूथली निभाया। मेरे हिस्से की शूटिंग पूरी तरह से कंप्लीट हो चुकी है। मैं अलग-अलग तरह के किरदार करना चाहती हूं, मुझे लगता है कि लोगों को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिलता है और मुझे लाइफटाइम सारे रोल्स करने हैं, चाहे वे छोटे हों या बड़े, पर एक स्केच्ड कैरेक्टर निभाना चाहती हूं। मैं अपने दर्शकों को हमेशा कुछ नया देती हूं, जैसे मैंने ‘कृष्णादासी’ में बहुत फेमस और खूबसूरत रोल किया था, जिसके लिए मुझे दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड भी मिला था। ‘रामायणम्’ के सेट पर रणबीर कपूर के साथ आपका अनुभव कैसा रहा? रणबीर कपूर के साथ ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन दोनों तरह के रिश्ते अच्छे हैं। ऑफस्क्रीन हम बहुत बातें करते थे और उनसे मैंने सिनेमा के बारे में बहुत कुछ सीखा। उनका समर्पण, उनके सिद्धांत और उनकी ईमानदारी सीन में झलकती है। वे एक्टिंग में जोर नहीं डालते बल्कि बहुत सरलता व सहजता से काम करते हैं। वे अपने सह-कलाकारों को भी क्यू देते हैं और हर चीज में शामिल रहते हैं। वह बहुत सकारात्मकता फैलाने वाले और दयालु इंसान हैं। क्या अब फिल्मों की ओर अधिक रुख कर लिया है? नहीं ऐसा नहीं है। मैं टीवी कभी नहीं छोडूंगी, क्योंकि टीवी ने हमेशा मुझे इज्जत दी है और मेरा रोजी-रोटी इसी से चलती है लेकिन हां, अगर फिल्में मिलेंगी तो मैं फिल्में भी करूंगी। मैं एक आर्टिस्ट हूं और मेरे लिए बड़ा परदा या छोटा परदा में कोई फर्क नहीं है। मैंने जितनी मेहनत छोटे परदे पर की है, उतनी ही मेहनत बड़े परदे पर भी की है। हालिया रिलीज साउथ की फिल्म ‘जटाधारा’ के बारे में बताइए? ‘जटाधारा’ हाल ही में रिलीज हुई है और उसे बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। मुझे लगता है कि इंडस्ट्री में मेरे 24 साल के अनुभव का फायदा अब फिल्मों में मिल रहा है। हालांकि ‘जटाधारा’ में रोल उतना पावरफुल नहीं था लेकिन मैं शो की प्राइम कास्ट में थी और काफी दिख रही हूं। मुझे लगता है कि मैं थोड़ी अंडररेटेड एक्ट्रेस रही हूं और बड़े पैमाने पर रोल्स कर सकती हूं। क्या ‘जटाधारा’ के बाद साउथ से और ऑफर आने की उम्मीद है? हां, मुझे ‘जटाधारा’ के रिस्पॉन्स के बाद ऑफर आने की उम्मीद है। हालांकि अभी तक तो नहीं आए हैं लेकिन मुझे लगता है कि जरूर आएंगे। फिलहाल, मैं ‘गंगा मैया की बेटियां’ की शूटिंग में व्यस्त हूं। साउथ इंडस्ट्री में काम करने का अनुभव कैसा रहा? साउथ इंडस्ट्री में लोग बहुत अनुशासित हैं। वहां आपको अच्छे मौके मिलते हैं, आप अच्छे पैसे और नाम कमाते हैं और अच्छे ग्रुप के साथ काम करते हैं। मैं ‘दृश्यम’ या ‘बाहुबली’ जैसी कोई फिल्म करना चाहती हूं, जहां हर किरदार महत्वपूर्ण हो, जैसे ‘बाहुबली’ में राम्या कृष्णन जी का रोल। मेरा औरा, फेस और बॉडी लैंग्वेज मजबूत किरदारों के लिए अधिक सूट करता है।
