आदित्य जांभले ने ‘बारामूला’ की शूटिंग का किस्सा शेयर किया:बोले-  बर्फीले पहाड़, भूकंप, आतंक और डर  के बीच लगा कि कोई घूर रहा है

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फिल्म ‘आर्टिकल 370’ के बाद निर्देशक आदित्य सुहास जांभले की फिल्म ‘बारामूला’ को भी दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। आर्टिकल 370 जहां पॉलिटिकल थ्रिलर फिल्म थी, वहीं बारामूला हॉरर-सुपरनैचुरल फिल्म है। दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान आदित्य सुहास ने फिल्म बारामूला की शूटिंग के कुछ किस्से शेयर करते हुए बताया कि अब वे एक्शन जॉनर की फिल्म अपने तरीके से बनाना चाहते हैं। पेश है बातचीत के कुछ खास अंश.. सवाल: फिल्म ‘बारामूला’ की शूटिंग के दौरान किस तरह का अनुभव रहा? जवाब: फिल्म की शूटिंग काफी मुश्किल थी क्योंकि यह मेरी पहली फिल्म थी और हमने पूरी फिल्म बिना किसी ग्रीन स्क्रीन या VFX के केवल कश्मीर में 23 दिनों में शूट की। दिसंबर-जनवरी की बहुत ठंड में, जहां तापमान -15 से -18 डिग्री तक होता था, हमें हाइपोथर्मिया और अन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शूटिंग के दौरान भूकंप और स्नोस्टॉर्म भी आए, साथ ही श्रीनगर के पास ग्रेनेड ब्लास्ट भी हुआ। फिर भी, जब फिल्म Netflix पर रिलीज हुई और लोगों ने इसे अच्छा सराहा, तो बहुत खुशी हुई। सवाल: फिल्म की शूटिंग दिसंबर और जनवरी में ही क्यों की गई? जवाब: इस फिल्म के लिए बर्फ बहुत जरूरी थी। कहानी लिखते समय मेरे दिमाग में एक खास तरह की बर्फीली जगह थी, जैसे हॉलीवुड की फिल्मों में स्नो से ढके पहाड़ होते हैं। बर्फ इस फिल्म में एक किरदार की तरह है। मैंने पूरी फिल्म एक ही मौसम में, यानी ठंड और बर्फ के मौसम में शूट करना चाहा। बर्फ के बीच जब एक्टर्स बोलते हैं और उनकी सांस की भाप दिखती है, तो वो असली जैसा लगता है, जो कंप्यूटर से नहीं दिख सकती। मैं चाहता था कि दर्शक खुद को बारामूला की ठंडी जगह पर महसूस करें। इसलिए मैंने ठान लिया था कि शूटिंग के लिए बर्फ चाहिए। लेकिन हमें उतनी बर्फ नहीं मिली जितनी उम्मीद थी। क्योंकि जब हम जगह देखने गए थे तो ठंड ज्यादा थी, लेकिन बर्फ थोड़ी देरी से आई। करीब 10-12 दिन की शूटिंग के बाद बर्फ मिली। सवाल: इस फिल्म से कई लोग बारामूला से जुड़े हैं, उनके बारे में बताएं। जवाब: मानव कौल और भाषा सुम्बली बारामूला से हैं। प्रोड्यूसर्स आदित्य धर और लोकेश धर भी कश्मीर के हैं। कई लोकल एक्टर्स में से कुछ बारामूला के थे। यह जरूरी था क्योंकि फिल्म की कहानी और किरदार बहुत गहरे और जटिल हैं, इसलिए ऐसे एक्टर्स चाहिए थे जिनका बारामूला से जुड़ाव हो। इससे उनकी परफॉर्मेंस में दम आता है और वे किरदार को बेहतर निभा पाते हैं। मेरे लिए भी अच्छा था क्योंकि वे एक्टर्स अपने कल्चर को समझते थे, जिससे काम आसान हो गया। सवाल: बारामूला सुपरनैचुरल हॉरर फिल्म की शूटिंग के दौरान कोई ऐसा अनुभव हुआ जो अलग या डरावना था? जवाब: हां, बहुत हुआ। हमने जो घर चुना था, वह श्रीनगर के बाहर था, पीछे नगीन झील थी और बहुत ठंड रहती थी। वह जगह पहले एक हॉस्पिटल था जहां कुछ दर्दनाक हादसे हुई थीं। शूटिंग करते हुए क्रू को लगता था जैसे कोई देख रहा हो। एक रूम था जहां हमारा क्लाइमेक्स सीन शूट हुआ, वहां बहुत भावनाएं थीं। मैंने वहां 13 दिन शूट किया और अंतिम दिन ऐसा महसूस हुआ कि मैं वापस लौटूंगा। प्रॉपर्टी के रखवाले चाचा ने मुझे शूटिंग के बाद वह घर का ताला दिया, जो मैं अब भी संभाल कर रखता हूँ। बाद में उसी जगह ‘आर्टिकल 370’ का एक छोटा सीन फिर से शूट करना पड़ा, और पता चला कि वही रूम था। चाचा के बारे में आज तक पता नहीं चला कि वे कहां गए। सवाल: आपने 23 दिनों में पूरी फिल्म शूट की, उस दौरान कई लोग बीमार भी हुए। फिर भी शूटिंग कैसे चली? जवाब: बहुत दिक्कतें आईं, कई लोग बीमार भी हुए। लेकिन टीम में हर कोई बहुत मेहनती था क्योंकि ये उनकी पहली बड़ी फिल्म थी। सभी के अंदर गुस्सा और चाहत थी कि ये फिल्म बहुत अच्छी बने। इसलिए सबने मेहनत की और मुश्किलों के बावजूद फिल्म पूरी की। सवाल: ‘बारामूला’ फिल्म की शूटिंग तो फिल्म ‘आर्टिकल 370’ से पहले हुई थी, फिर फिल्म रिलीज ‘आर्टिकल 370’ के बाद क्यों हुई? जवाब: फिल्म ‘बारामूला’ की शूटिंग जनवरी 2023 में खत्म हुई थी, उसी समय मैं ‘आर्टिकल 370’ से जुड़ा था। उस प्रोजेक्ट की वजह से ‘बारामूला’ की एडिटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन में काफी देरी हो गई। ‘आर्टिकल 370’ की डेडलाइन के कारण हमने पहले वो प्रोजेक्ट रिलीज किया और ‘बारामूला’ बाद में पूरी तैयारी के साथ रिलीज हुई। सवाल: लेकिन ‘बारामूला’ थिएटर में ना रिलीज होकर सीधे ओटीटी पर क्यों रिलीज हुई। क्या यह फिल्म खास ओटीटी के लिए ही बनाई गई थी? जवाब: नहीं, ये फिल्म शुरुआत से ही थिएटर के लिए बनाई गई थी क्योंकि थिएटर का अनुभव अलग होता है। लेकिन फिल्म को रिलीज करने का फैसला कई चीजों पर निर्भर करता है जैसे फिल्‍म का बजट, कास्ट, और मार्केटिंग। इस फिल्म को बनने में लगभग 5 साल लगे और कई बार उसे रिलीज को लेकर मुश्किलें आईं। इसलिए आखिर में थिएटर के बजाय नेटफ्लिक्स पर रिलीज करना बेहतर लगा। नेटफ्लिक्स ने फिल्म को अच्छे तरीके से प्रमोट किया और यह 190 देशों में कई भाषाओं में पहुंची। सवाल:आदित्य धर खुद डायरेक्टर हैं। उन्होंने आपको फिल्म डायरेक्ट करने की जिम्मेदारी कैसे दी? आपकी उनसे कैसे पहली मुलाकात हुई और भरोसा आप दोनों ने कैसे बनाया? जवाब: हमारी मुलाकात नेशनल अवॉर्ड समारोह में हुई, जब आदित्य धर की फिल्म ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ को नेशनल अवॉर्ड मिला था और मेरी शॉर्ट फिल्म भी नेशनल अवॉर्ड जीती थी। उन्होंने मेरी पंजाबी शॉर्ट फिल्म ‘अमृतसर जंक्शन’ देखी और पसंद की। उनकी फिल्म “अश्वत्थामा” का प्री-प्रोडक्शन चल रहा था। वे चाहते थे कि उनकी डायरेक्शन टीम के साथ जुड़ जाऊं और उनके साथ काम करूं, लेकिन मैंने साफ कहा कि मैं उनके नीचे असिस्टेंट या रोल में नहीं आना चाहता, मुझे खुद डायरेक्ट करनी है। इसके बाद मैं दो महीने गोवा चला गया। फिर आदित्य ने मुझे कॉल किया और कहा कि वे मेरे साथ डायरेक्टर के तौर पर काम करना चाहते हैं। उन्होंने कुछ स्क्रिप्ट्स दिखाई, जो मुझे नहीं पसंद आईं। मैंने उनसे कहा कि मैं क्रिटिकल हूं और सिर्फ सही कहानी के साथ काम करूंगा। आदित्य का एक कश्मीर में हॉरर फिल्म बनाने का आइडिया था, लेकिन मैं उसे बदलकर एक नई स्क्रिप्ट लेकर तीन महीने बाद वापस आया। इस तरह हमारा भरोसा बना और उन्होंने मुझे मौका दिया। सवाल: यह आइडिया आपको कैसे और क्यों आया? जवाब: मुझे हॉरर फिल्म बनानी नहीं थी, इसलिए यह विषय दिमाग में आया। लोग कहते थे हॉरर फिल्म बनानी चाहिए, लेकिन मैं कुछ नया करना चाहता था। हॉरर में डर का मतलब सिर्फ भूत दिखाना नहीं होता, असली डर तो उस चीज से है जिसे हम नहीं देख पाते। मुझे वो फिल्म बनानी थी जो देखने के बाद डर के साथ दिल को भी छू जाए, जैसे कुछ वेस्टर्न हॉरर फिल्मों में होता है। मैं पूरी स्क्रिप्ट बिना किसी से पूछे खुद लिख आया और आदित्य को भी बाद में समझ में आया कि यह नया तरीका सही है। मैं इंजीनियर भी हूं, तो मुझे जटिल बातें आसान बनाने में मजा आता है। इसलिए मैंने कहानी ऐसे लिखा जिससे डर और एक गहरा असर दोनों हो। सवाल: इंजीनियरिंग करते हुए आपको कब लगा कि फिल्म इंडस्ट्री में जाना है? आपको इस बात की प्रेरणा कहां से मिली? जवाब: पुणे और मुंबई में इंजीनियरिंग के दौरान बड़े-बड़े कॉलेज में ड्रामा प्रतियोगिताएं होती हैं, जैसे फिरोदिया करंडक, पुरुषोत्तम करंडक, आईएनटी, सवाई करंडक। ये प्रतियोगिताएं नेशनल स्तर की होती हैं और बहुत कड़ी टक्कर रहती है। मैं गोवा से हूं, और गोवा के कॉलेज अक्सर आसानी से क्वालिफाई नहीं कर पाते थे क्योंकि ये इतना आसान नहीं होता। इसमें पहले फाइनल जीतना जरूरी होता है, तभी आप प्राथमिक यानी पहले राउंड के ऑडिशन में जा सकते हो। सीधे ऑडिशन में नहीं जा सकते। पहले आपको विजेता बनना पड़ता है तभी आगे बढ़ पाते हो। इसलिए गोवा की टीम कभी आगे नहीं बढ़ पाई थी। मैंने सोचा कि मैं तीसरे साल तक गोवा को उस मंच तक ले जाऊंगा। धीरे-धीरे मेरी टीम ने बड़े कॉम्पिटिशन में अच्छा प्रदर्शन किया, मुझे बेस्ट एक्टर का भी पुरस्कार मिला। 2014 में मैंने ₹2 करोड़ के बजट से एक बड़ा ड्रामा “वंदे मातरम” किया, जिसमें असली हाथी, घोड़े और बड़े सेट थे। इस सबने मुझे बड़ा मौका और मंच दिया। सवाल: नाटकों का बजट बहुत बड़ा होता है, क्या सरकार खर्च करती है? जवाब: नहीं, ये प्राइवेट प्रोड्यूसर्स करते थे। नाटक प्री-रिकॉर्डेड होते थे और करीब 100-150 कलाकार होते थे। जैसे रामलीला, ये कई दिनों तक एक जगह चलते रहते थे। मैं तब इंडस्ट्री में था, लोगों ने कहा मेरी भाषा थिएटर की नहीं, फिल्मों की है। फिर मैं मुंबई आ गया और साइबर सिक्योरिटी की नौकरी छोड़ दी। सवाल: आपने नौकरी छोड़ने का फैसला कैसे लिया? जवाब: मन में एक आवाज बार-बार कह रही थी कि अभी छोड़ दो, नहीं तो मौका निकल जाएगा और बाद में पछताओगे। सवाल: क्या फैमिली ने जॉब छोड़ने से रोका था क्योंकि यह बड़ा फैसला था? जवाब: हां, परिवार ने बहुत रोका था। वे कहते थे कि आगे शादी होगी, जिम्मेदारियां आएंगी, तब कैसे संभालोगे? मैं भी सोचता रहा, विलंब करता रहा। फिर मेरे एक दोस्त ने कहा कि मैं सिर्फ किसी को दोष देने के लिए बहाना ढूंढ रहा हूं। उसने कहा कि ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, कुछ भी बहुत बुरा नहीं होगा। इससे मुझे हिम्मत मिली और मैंने तुरंत नौकरी छोड़ दी। अब मैं अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी खुद लेता हूं और किसी को दोष नहीं देता। सवाल: ‘आर्टिकल 370’ और ‘बारामूला’ के बाद आप अब क्या कर रहे हैं? जवाब: मैं अभी तीन-चार प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा हूं। मेरा खास प्रोजेक्ट है, जिस पर मीटिंग्स चल रही हैं। अब मैं अलग-अलग फिल्म जॉनर में काम करना चाहता हूं। आर्टिकल 370 की फिल्म पॉलिटिकल थ्रिलर थी, बारामूला हॉरर-सुपरनैचुरल थी। अब मैं ज्यादा एक्शन जॉनर में फिल्म बनाना चाहता हूं, लेकिन नया और बेहतर तरीके से। मैं जल्दीबाजी नहीं करना चाहता, क्योंकि अच्छा काम करना जरूरी है। मेरी उम्र अभी 34 साल है, इसलिए सोच-समझकर काम कर रहा हूँ। मेरी फिल्म बारामूला पर रिसर्च भी हो रही है, इसलिए आगे बड़ा काम करने के लिए सोच-समझ के और बेहतर बनाना चाहता हूं। सवाल: आदित्य धर की फिल्म ‘अश्वत्थामा’ की क्या स्थिति है? जवाब: अभी अश्वत्थामा का काम रुका हुआ है क्योंकि बजट जैसी दिक्कतें आई थीं। आदित्य धर की दूसरी फिल्म ‘धुरंधर’ हाल ही में रिलीज हुई है और वह बहुत अच्छी चली। अश्वत्थामा उनका पैशन प्रोजेक्ट है, लेकिन इसे पूरा करने के लिए जरूरी संसाधनों और वक्त की जरूरत है। इंडिया में यह सब असिमिलेट करने में समय लगता है, इसलिए फिलहाल इसे रोक दिया गया है। उम्मीद है कि भविष्य में यह प्रोजेक्ट फिर से चालू होगा।

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