बंदी नंबर 8115/38, रायपुर सेंट्रल जेल में सजा काट रहे 25 साल के वासुदेव चौहान की पहचान कुछ दिनों पहले तक इन्हीं अंकों तक सीमित रह गई थी। लेकिन अब जेल एडमिनिस्ट्रेशन के लोग और बाकी बंदी उन्हें गीता-व्रती कहकर पुकारते हैं। सजा काट रहे अपने बाकी साथियों के लिए वासुदेव बानगी हैं। दरअसल, वासुदेव ने श्रीमद्भगवतगीता के सभी 18 अध्यायों के 700 श्लोक कंठस्थ कर लिए हैं। कठिन परीक्षा पास करने के बाद उन्हें गीता-व्रती की उपाधि दी गई है। वासुदेव छह राज्यों की जेल में 600 से अधिक बंदियों के बीच अकेले हैं, जिन्हें ये उपाधि मिली है। पिछले दो साल से वासुदेव गीता का पाठ कर रहे हैं। उनके साथ सेंट्रल जेल के 42 अन्य कैदी भी रोजाना गीता पाठ करते हैं। लेकिन सारे श्लोक कंठस्थ हो जाना वासुदेव के हिस्से में ही आया। उनके के लिए ये जर्नी आसान नहीं थी।वासुदेव से हमने बात कि उन्होंने बताया कम उम्र में वो गलत संगत में पड़ गए। 20 साल की कैद हुई, परिवार-दोस्त दूर हो गए इस बीच एक रेप केस में इन्वॉल्व हुए, ट्रायल चलने तक महासमुंद की जेल में बंद थे। जब जेल पहुंचे, परिवार वालों ने दूरी बना ली। कोई मिलने नहीं आता था। दोस्त जिनकी संगत में बिगड़े उन्होंने पूछा तक नहीं। कोर्ट ने 20 साल कैद की सजा सुनाई। सजा मिलने के बाद महासमुंद की जेल से दो साल पहले रायपुर सेंट्रल जेल में शिफ्ट हुए। छह साल की सजा पूरी हो चुकी है, 14 और साल जेल में ही काटने है। वासुदेव बताते हैं कि वो खुद के साथ दूसरों के लिए भी हीन हो चुके थे। जिंदगी समाप्त करने के बारे में सोचने लगे थे। लेकिन तभी एक दिन जेल प्रशासन ने बताया कि गीता की क्लास शुरू कर रहे हैं। अंधेरे और अकेलेपन के बीच गीता बनी सहारा जो कैदी चाहे, क्लास ले सकता है। वासुदेव को शुरुआत में दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन जेल में दूसरा कोई विकल्प भी उन्हें नहीं दिख रहा था, रोज खुद के भीतर उठ रहे विचारों के मंथन को शांत करने उन्होंने गीता क्लास ज्वाइन कर ली। तब मोटिव सिर्फ इतना ही था कि खुद को किसी दूसरे काम में एंगेज रखा जाए। धीरे-धीरे चीजें बदलने लगी, गीता से वो कनेक्ट होने लगे। वासुदेव बताते हैं कि क्लास के बाद वो रोज तीन बार गीता ही पढ़ते। ये उन्हें शांत रखने लगा। जिस अकेलेपन और अंधेरे के चलते वो जिंदगी छोड़ना चाहते थे। वही जिंदगी अब उन्हें मीनिंगफुल लगने लगी। जेल में लोगों का व्यवहार बदला, अब परिवार वालों की फिक्र नहीं वासुदेव ने बताया कि जेल में भी उन्हें बाकी कैदी सम्मान की नजर से देखने लगे हैं। कोई मन-मुटाव या विवाद की स्थिति अब जेल के भीतर कैदियों में नहीं बनती। गीता-व्रती की उपाधि के बारे में उन्होंने अब अपने परिवार के किसी दोस्त को भी नहीं बताया है। कारण पूछने पर कहते हैं कि अब उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उनके परिवार के किसी सदस्य या दोस्त को इसके बारे में मालूम है या नहीं। मुझे पहले की तरह गुस्सा और ग्लानि नहीं होती है। गीता परिवार की सहायता से पाठ करना सीख रहे कैदी जोकि गीता के सारे श्लोक संस्कृत में है, इन्हें पढ़ना और समझना वासुदेव और अन्य कैदियों के लिए आसान नहीं है। वासुदेव तो सिर्फ प्राइमरी तक ही पढ़े हैं। कभी संस्कृत पढ़े तक नहीं थे। ऐसे में गीता परिवार नाम की एक संस्था है, जो इन कैदियों के लिए ऑनलाइन क्लास चलाती हैं। ये संस्था इस समय देश के छह राज्यों की जेलों में 600 से अधिक कैदियों को गीता पाठ की ट्रेनिंग ऑनलाइन दे रही है। संस्था की सदस्या ने सीमा अरूण मिश्रा ने बताया कि वासुदेव से जब वो पहली बार मिली, उनकी नजरें झुकी हुई थी। सिर तक नहीं उठा पाता था। लेकिन अब उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव हुए हैं। चार चरण की परीक्षा के बाद मिली गीता-व्रती की उपाधि सीमा ने बताया संस्था चार चरण की परीक्षा पास करने के बाद ही किसी पाठक को गीता-व्रती की उपाधि देती है। पहले चरण में गीता-जिज्ञासु की उपाधि मिलती है। ये उपाधि उनको मिलती है , जो गीता के तीन अध्याय कंठस्थ कर लेते हैं। 6 अध्याय के श्लोक याद करने पर गीता पाठक, 12 याद करने पर गीता पथिक और पूरे 18 अध्याय याद करने पर गीता-व्रती की उपाधि मिलती है। देश में वासुदेव पहले ऐसे कैदी हैं जिन्हें ये उपाधि संस्था ने दी है। साल 1986 में हुई थी गीता परिवार की स्थापना गीता परिवार की स्थापना 1986 में महाराष्ट्र के संगमनेर में की गई थी। इसकी स्थापना अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी गोविंद देव गिरी महाराज ने की है। इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति और भगवद गीता की शिक्षा का प्रसार है। इस समय यह संस्था विश्व के 180 देशों और भारत के 9 राज्यों सक्रिय है। 19 भाषाओं में गीता का प्रसार अब तक किया जा रहा है। …………………………… इस तरह की और भी खबर पढ़ें… रायपुर में बच्चे फर्राटे से बोलते हैं गीता के श्लोक:5-13 साल के बच्चों को कंठस्थ; भगवद गीता की शिक्षा दे रहा ‘गीता परिवार’ रायपुर की रहने वाली कक्षा तीसरी में पढ़ने वाली 7 साल की श्रीनिधि को भगवद् गीता के कई श्लोक कंठस्थ याद हैं। वो फर्राटे से श्लोक बिना देखे ही बोल देती है। श्रीनिधि ‘लर्न गीता’ केंद्र से जुड़ी है जहां बच्चों को गीता का पाठ पढ़ाया जाता है। पढ़ें पूरी खबर
