‘मुस्लिम नाम होने से कोई परेशानी नहीं आई’:फिल्म रामायण के लिए संगीत बना रहे ए.आर. रहमान बोले- यह आदर्शों की कहानी है

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म्यूजिक कंपोजर ए. आर. रहमान ने फिल्म रामायण के लिए म्यूजिक तैयार करने को लेकर बुधवार को कहा कि रामायण मानवीय मूल्यों और आदर्शों की कहानी है। धर्म से परे ज्ञान हर जगह मिलता है। इस प्रोजेक्ट को लेकर उनके मुस्लिम नाम की वजह से उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। दरअसल, बीबीसी को दिए इंटरव्यू में रहमान से पूछा गया कि आप इस समय फिल्म रामायण के लिए म्यूजिक बना रहे हैं। आपका नाम मुस्लिम है और क्या आपके मन में कभी यह ख्याल आता है कि कुछ लोग शायद नहीं चाहेंगे कि आप इस तरह के प्रोजेक्ट से जुड़े हों? जिस पर रहमान ने कहा कि नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। मैंने ब्राह्मण स्कूल में पढ़ाई की है। वहां हर साल रामायण और महाभारत पढ़ाई जाती थी, इसलिए मुझे इसकी कहानी अच्छी तरह पता है। यह कहानी एक अच्छे इंसान, उसके चरित्र, ऊंचे आदर्शों और मूल्यों के बारे में है। लोग इस पर बहस कर सकते हैं, लेकिन मैं इन सभी अच्छी बातों को महत्व देता हूं। उन्होंने यह भी कहा कि अच्छी बातें हमें हर चीज से सीखनी चाहिए। पैगंबर ने भी कहा है कि ज्ञान बहुत कीमती होता है। मुझे हदीस का पूरा मतलब नहीं पता, लेकिन इतना जानता हूं कि ज्ञान बहुत मूल्यवान है। हम रोजमर्रा की जिंदगी से हर किसी से सीख सकते हैं चाहे वह भिखारी हो, राजा हो, नेता हो, या फिर किसी की गलत हरकत हो या अच्छी। ज्ञान एक ऐसी चीज है जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। हमें हर जगह से सीखना चाहिए। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि मैं यहां से कुछ नहीं सीखूंगा या वहां से अच्छी बातें नहीं लूंगा। फिल्म का म्यूजिक दो फेमस कंपोजर्स बना रहे हैं फिल्म रामायण का म्यूजिक दो जाने-माने कंपोजर्स मिलकर बना रहे हैं। रहमान फिल्म के गाने, संस्कृत श्लोक और इंडियन क्लासिकल म्यूजिक पर काम कर रहे हैं। जबकि मशहूर हॉलीवुड कंपोजर हैंस जिमर बैकग्राउंड स्कोर और साउंडस्केप बना रहे हैं। जिमर ने द लायन किंग, ग्लेडिएटर, द डार्क नाइट ट्रिलॉजी, और पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन जैसी कई फेमस फिल्मों के लिए म्यूजिक दिया है। वहीं, फिल्म के गानों और भजनों के लिरिक्स कुमार विश्वास ने लिखे हैं। 8 सालों में परिस्थितियां बदली हैं: रहमान इसी इंटरव्यू में रहमान ने कहा है कि पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव आया है। दरअसल, जब रहमान से पूछा गया कि क्या 1990 के दशक में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखते समय उन्हें किसी तरह के पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ा था, इस पर रहमान ने कहा कि शायद उस दौर में उन्होंने ऐसा कभी महसूस नहीं किया, लेकिन पिछले 8 सालों में परिस्थितियां बदली हैं। पावर शिफ्ट हुआ है। अब फैसले लेने की ताकत ऐसे लोगों के हाथ में है, जो रचनात्मक नहीं हैं। कई बार उन्हें दूसरों से सुनने को मिलता है कि उन्हें किसी प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था, लेकिन बाद में म्यूजिक कंपनी ने अपने पसंदीदा कंपोजर को काम दे दिया। हो सकता है कि यह कोई सांप्रदायिक मामला भी रहा हो, लेकिन उनके सामने ऐसा कभी नहीं हुआ। सुभाष घई की सलाह पर सीखी हिंदी-उर्दू
रहमान ने यह भी बताया कि वे दक्षिण भारत से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आने वाले पहले ऐसे संगीतकार थे, जिन्होंने बॉलीवुड में जगह बनाई। उन्होंने कहा कि मणिरत्नम की रोजा, बॉम्बे और दिल से.. के बावजूद वे बाहरी ही माने जाते थे, लेकिन डायरेक्टर सुभाष घई की फिल्म ताल ने उत्तर भारत में उन्हें घर-घर पहचान दिलाई। रहमान ने यह भी बताया कि घई की सलाह पर ही उन्होंने हिंदी और फिर उर्दू सीखने का फैसला किया।

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