बच्चों को भड़काते, गुस्सा पैदा कर अपने साथ जोड़ते थे:जिस कॉलेज पर हमला किया, वहां भविष्य बना रहे सरेंडर-नक्सली; सिलाई-ड्राइविंग, मैकेनिक वर्क सीख रहे

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छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले का लाइवलीहुड कॉलेज। अब यह एक सामान्य कॉलेज नहीं है। चारों तरफ फोर्स का घेरा है। बिना पुलिस की अनुमति के कोई अंदर नहीं जा सकता। क्योंकि यहां 110 आत्मसमर्पित नक्सली रहते हैं। इसे नक्सलियों का पुनर्वास केंद्र बनाया गया है। जो कभी हाथों में बंदूक लेकर कॉलेज पर हमला करते थे, अब वे यहां सिलाई, ड्राइविंग, नल-सोलर मिस्त्री जैसे कोर्स की ट्रेनिंग ले रहे हैं। इनका एक अतीत है, जिसे सुनकर कोई भी घबरा जाएगा। इन लोगों ने लंबा समय जंगल में बिताया है। एक-एक व्यक्ति पर 8-8 लाख का इनाम था। दैनिक भास्कर ने इन आत्मसमर्पित नक्सलियों से यह जानने की कोशिश की, कि आखिर एक मासूम आदिवासी दुर्दांत नक्सली कैसे बन गए। पढ़िए सरेंडर नक्सलियों की कहानी उनकी जुबानी मैं पंडीराम ध्रुव कटुलनार नारायणपुर का रहने वाला हूं। जब मैं 21 साल का था, तब हमारे गांव में संगठन के लोग आते। नाटक करते। पर्चे-बुकलेट को बांटते। हमें जल, जंगल, जमीन को बचाने की बात समझाते। उनके विचारों से प्रभावित होकर 2010 में मैं पार्टी से जुड़ गया। वे मुझे जंगल में ले गए, वहां दलम (छोटी टुकड़ी) के साथ सीधी भर्ती कर दिया गया। पहले मुझे बंदूक साफ करने का काम दिया गया। फिर मैं खुद चलाना सीखा। पुलिस के साथ 4 मुठभेड़ में हम आमने-सामने हुए। लेकिन एक भी बार पुलिस हमें पकड़ नहीं पाई। जंगलों को हम जितना जानते हैं फोर्स भी नहीं जानती। जब मैं संगठन में आया तो मेरी शादी हो चुकी थी। पार्टी का नियम है कि अनुमति लेकर पत्नी से मिलने जा सकते हैं। मुझे शुरुआत में पत्नी की बहुत याद आती थी। दो-चार साथी लेकर मैं परिवार से मिलने जाता था। हम डेरा बदलते रहते थे। हमें कोई वेतन नहीं मिलता था, बस जंगल को बचाना है यही हमारा उद्देश्य था। रूपेश दा के साथ 210 लोगों ने सरेंडर किया, हम भी साथ आने वाले थे। लेकिन तब नहीं आ पाए। बाद में सलाह लेकर मुख्य धारा में जुड़े हैं। अभी तो कुछ समझ नहीं आ रहा। बस यह है कि जंगल की जिंदगी से यह अच्छी है। समाज की मुख्यधारा में लौटने के बाद डर कॉलेज के प्राचार्य मानकलाल अहिरवार बताते हैं कि आज भी ये अपने अतीत और भविष्य को एक साथ सोचकर नाखूनों से दीवार खरोचने लगते हैं। कुछ को तो कभी हंसते देखा ही नहीं। कुछ ऐसे हैं जो अपने गांव लौटना ही नहीं चाहते। मूल धारा में मिलने से इन्हें डर लगता है। इनकी खमोशी इनके अंदर के छिपे दर्द को साफ बयां करती है। लेकिन एक बात है कि ये बहुत ही अनुशासित है। सीखने की ललक है। बचपन से डॉक्टर बनना, नक्सलियों ने सपना पूरा किया: सुखलाल मैं ऐनमेटा गांव का रहने वाला हूं। 8वीं तक पढ़ा हूं। यह बात है 2006 की है। तब मैं आकाबेड़ा में पढ़ता था, नक्सली मेजर दिलीप आते थे। वे कहानी किस्से सुनाते। उससे मैं क्रांति की ओर आकर्षित हो गया। 14 साल की उम्र में संगठन से जुड़ा। पहले मुझे 5 लोगों के दलम में जोड़ा गया। 4-5 महीने बाद बंदूक की ट्रेनिंग दी। मेरा बचपन से सपना था डॉक्टर बनूं, सेवा करूं। लीडर को जब पता चला तो उन्होंने बंगाल से आए डॉक्टर शंकर से मेरी ट्रेनिंग करवाई। तीन महीने में ही मैं कमर दर्द, उल्टी, दस्त, छोटी सर्जरी करना सिखाया गया। जैसे कारतूस को निकालकर टांका लगाना। नसबंदी करना। 2022 के बाद फोर्स का मूमेंट बढ़ा। 23 मई 2024 को रेकावाया में हमें घेर लिया गया। तब मैं रेला दीदी का इलाज कर रहा था। दीदी आंध्र प्रदेश से आई थीं। वे शिक्षा विभाग की मुखिया हैं। मुठभेड़ में 8 लोग मारे गए। 10 जान बचाकर भाग पाए। पुलिस के हाथ हमारा सारा साहित्य लग गया। इसके बाद 4 अक्टूबर 2024 को थुलथुली में कामरेड फंस गए। यहां भी बहुत लोग मर गए। 14 घायल हुए। वे मेरे पास इलाज के लिए आए। 7 लोगों को तो मैंने बचा लिया। रामशीला को सही इलाज न मिलने की वजह से वे मर गईं। उसके बाद मैं बहुत डर गया। जवानों की तरफ से जंगल में पोस्टर फेंके जा रहे थे, उन सब ने भी हमारे दिमाग को बदला। 20 अगस्त 2025 को मैंने सरेंडर कर दिया। मैं बीजीएल, 12 बोर बनाता था: दिवाकर गावड़े मैं कांकेर जिले का रहने वाला हूं। जब सलवा जुड़ूम चरम पर था। फोर्स गांव वालों को आकर मारती थी। नक्सली संगठन नाच गाना दिखाते। मैं प्रभावित होकर 2004 में उनके साथ चला गया। पहले मुझे मानपुर में प्लाटून कमांडर बनाया गया। फिर डीविजल कमांड चीफ बन गया। 2009 में राजनांदगांव में 150 साथियों ने पुलिस को चारों तरफ से घेर लिया। एसपी चौबे सहित 29 पुलिस वालों को मार गिराया। उस समय मुझे कवर पर रखा गया था। 2017 में मेरी बदली अबूझमाड़ में हो गई। यहां मुझे बंदूकें बनाना सिखाया गया। चंद दिनों में ही मैं बीजीएल से लेकर 12 बोर तक बनाने लगा। जंगल में सप्लाई टीम के रतन भईया बारूद, शोरा, गंधक देकर चले जाते। कहते-यहां तुम्हारा सामान आ गया है, बनाओ। लोहे को जनरेटर से बेल्डिंग करके हम पाइप बनाते थे। ट्रकों के नीचे की पट्टी से बेरल पाइप बनाते थे। हमारे बनाए गए हथियारों का उपयोग कई बार पुलिस की मुठभेड़ में किया गया। झीरम में भी ऐसे ही हथियारों से वार किया गया था। पुलिस के कार्रवाई से डरकर हमने 8 अक्टूबर 2025 को सरेंडर कर दिया। अभी जंगल से यहां आकर एडजस्ट होने में थोड़ा मुश्किल हो रहा है। लेकिन यह जिंदगी अच्छी है। घरवालों ने रोका था, लेकिन मैं प्रभावित हो चुकी थी: रमली मैं नारायणपुर जिले के परथापुर गांव की रहने वाली हूं। 2008 में संगठन के नाच-गाने से प्रभावित होकर मैं उनसे जुड़ी। हम 6 भाई बहन हैं। मैं दूसरे नंबर की हूं। जब मैं संगठन के साथ जाने लगी तो घरवालों ने रोका। लेकिन गरीबों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ मुझे लड़ना था। अपने हक के लिए मुझे बंदूक उठानी थी। इसलिए मैं उनके साथ जंगल चली गई। वहां अजय दा ने मुझे बंदूक चलाना सिखाया। बंदूक कहां से आई थी, मुझे नहीं पता। हमें यह बताया गया था कि पुलिसवाले हमारे दुश्मन हैं। पहले मुझे एरिया कमेटी में जोड़ा गया। एरिया के लिए 15 से 30 हजार रुपए आते थे। इसी में हमें सब्जी से लेकर तेल तक खरीदना होता था। हम जंगल में चलते ही रहते थे। अलग से पैसा कुछ नहीं मिलता था। बीमार होते समय डिवीजन कमेटी वाले हमारा इलाज करवाते थे। 2024 में मेरे पिता की मृत्यु हो गई। दूसरी तरफ पुलिस का दबाव बढ़ रहा था। इस वजह से मैंने हमारे नेता भास्कर और रूपेश दादा से विचार करके सरेंडर कर दिया। पति की कर दी गई नसबंदी: कमला जूरी मैं ऐनमेटा गांव, नारायणपुर की रहने वाली हूं। यह बात 2006 की है। गांव में आए दिन ​नक्सलियों का एक दल आया करता था। वह वहां नाटक करता। हमें बताता कि हमारा शोषण हो रहा है। जंगल काटे जा रहे हैं। खनिज को लूटा जा रहा है। यह सब सुनकर हमारा दिमाग बदल गया। मैं उनके साथ जंगल चली गई। वहां मुझे बंदूक चलाना सिखाया गया। मेरी नियुिक्त अबूझमाड़ में हुई। मुझे डिप्टी कमांडर बनाया गया। मैं गांव वालों के साथ मीटिंग करती थी। उन्हें अपनी ओर आने को कहती थी। इस दौरान मेरी एक साथी के साथ शादी हो गई। बाद में पति की नसबंदी कर दी गई। पुलिस जिस तरह से नक्सलियों को मारने लगी तो हमें लगा कि अब यहां रहना सुरक्षित नहीं है। अपने लीडर्स से बात करके मैंने 20 जुलाई 2025 को सरेंडर कर दिया। जंगल में 19 साल बिताने के बाद अब यहां रहना थोड़ा मुश्किल है। किसी से बात करने का मन भी नहीं करता है। मैं हमेशा चुप ही रहती हूं। नसबंदी के पीछे का कारण नक्सली संगठन में जो भी महिला औ पुरूष एक-दूसरे को पसंद करते थे, उनकी मर्जी से शादी करवा दी जाती थी। शादी आदिवासी रीति-रिवाज से होती थी। शादी के बाद पुरूष को यह समझाया जाता था कि बच्चे होंगे तो हमारे पांव में बेड़ियां बनेंगे। महिला को भी 6 महीने तक सुरक्षित रखना होगा। यहां इलाज का अभाव भी है। इस तरह की बातें कर उसे नसबंदी के लिए तैयार कर लिया जाता है। शादीशुदा हर पुरूष की संगठन में नसबंदी होती थी। इसके लिए डॉक्टर रखे गए थे। …………………….. इससे जुड़ी खबर भी पढ़ें… 300 से ज्यादा हत्या करने वाले नक्सली हिड़मा की ‘लव-स्टोरी’: लेटर लिखकर इजहार,2 साल बाद राजे ने हामी भरी,नसबंदी कराकर शादी की, अब दोनों ढेर छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश बॉर्डर पर सुरक्षाबलों ने मोस्ट वांटेड और डेढ़ करोड़ के इनामी नक्सली माड़वी हिड़मा और उसकी पत्नी राजे का एनकाउंटर कर दिया। कर्रेगुट्टा ऑपरेशन के बाद फोर्स के बढ़ते दबाव के चलते पत्नी राजे सरेंडर करना चाहती थी। उसे डर था कहीं दोनों मारे न जाएं। बार-बार हिड़मा से हथियार डालने कहती रही। पढ़ें पूरी खबर…

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