पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर का निधन:100 साल की उम्र में ली आखिरी सांस, मेलानोमा से पीड़ित थे; 2002 में नोबेल पीस प्राइज मिला

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पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर का जॉर्जिया स्थित अपने घर में 100 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। 1 अक्टूबर 1924 को जन्मे कार्टर 1977 से 1981 तक अमेरिका के 39वें राष्ट्रपति रहे। वे अमेरिका के इतिहास में सबसे ज्यादा उम्र तक जीवित रहने वाले राष्ट्रपति थे। कार्टर कुछ समय से मेलानोमा नाम की बीमारी से पीड़ित थे। मेलानोमा एक तरह का स्किन कैंसर होता है। यह उनके लिवर और दिमाग तक फैल चुका था। 2023 में उन्होंने हॉस्पिस केयर लेने का फैसला लेते हुए अपनी बीमारी का उपचार न कराने का फैसला लिया। राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद कई साल तक उन्होंने अपनी संस्था ‘कार्टर सेंटर’ के जरिए ह्यूमैनिटेरियन काम किए। उन्होंने जंग का हल निकालने, चुनाव निगरानी और बीमारियों को जड़ से खत्म करने की दिशा में काम किया। कार्टर सेंटर के जरिए किए गए कामों के लिए उन्हें 2002 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। कार्टर के बेटे बोले- मेरे पिता उन सबके लिए हीरो थे, जो प्यार में यकीन करते हैं जिमी कार्टर के बेटे चिप कार्टर ने रॉयटर्स से कहा कि न सिर्फ मेरे लिए, बल्कि उन सभी लोगों के लिए हीरो थे, जो शांति, मानवाधिकार और निस्वार्थ प्रेम में विश्वास रखते हैं। जिस तरह से वे लोगों को साथ लाया करते थे, उसकी वजह से आज यह पूरी दुनिया हमारा परिवार है। बाइडेन बोले- दुनिया ने असाधारण नेता खो दिया अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि आज अमेरिका और दुनिया ने एक असाधारण नेता, राजनेता और मानवतावादी खो दिया। छह दशक तक हमें जिमी कार्टर को अपना करीबी दोस्त कहने का सम्मान मिला। लेकिन जिमी कार्टर के बारे में असाधारण बात यह है कि अमेरिका और दुनिया भर के लाखों लोग जिन्होंने उनसे कभी मुलाकात नहीं की, वे भी उन्हें अपने करीबी दोस्त जैसा ही मानते थे। ओबामा बोले- प्रेसिडेंट कार्टर ने हमें गरिमापूर्ण जीवन का अर्थ समझाया पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जिमी कार्टर के निधन पर दुख जताया। उन्होंने कहा- राष्ट्रपति कार्टर ने हम सभी को सिखाया कि गरिमा, न्याय, सेवा और अनुग्रह से भरा जीवन जीने का क्या अर्थ होता है। मिशेल और मैं कार्टर परिवार और उन सभी के प्रति अपनी संवेदनाएं और प्रार्थनाएं भेजते हैं, जिन्होंने इस बेमिसाल व्यक्ति से प्रेम किया और उनसे सीख ली। किसान परिवार में पैदा हुए कार्टर अमेरिका के 39वें राष्ट्रपति बने
साल 1924 में जिमी कार्टर का जन्म अमेरिका के जॉर्जिया में एक किसान परिवार में हुआ था। 1960 में वो राजनीति में आए और 1971 में पहले बार अपने राज्य के गवर्नर बने। इसके ठीक 6 साल जिमी कार्टर ने रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति जेरालड फोर्ड को हराया और वो राष्ट्रपति बने। अपने कार्यकाल में कार्टर ने कई बड़ी चुनौतियों का सामना किया। जैसे शीत युद्ध के तनाव और तेल की अस्थिर कीमत और नस्लीय समानता और महिला अधिकारों को लेकर आंदोलन। 1978 में कैंप डेविड समझौता कराया, मिडिल ईस्ट में शांति बहाल की
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1978 में कैंप डेविड एकॉर्ड था, जो मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाचेम बेगिन के बीच हुआ ऐतिहासिक शांति समझौता था। इस समझौते से मिडिल ईस्ट में शांति कायम हुई और कार्टर को एक शांति समर्थक नेता के रूप में स्थापित हुए। हालांकि, अमेरिका में बढ़ते इकोनॉमिक रिसेशन और कार्टर की घटती लोकप्रियता उनके खिलाफ काम कर रही थी। तभी 1979 में ईरान में हुई क्रांति ने अमेरिकी समर्थक शाह को सत्ता से उखाड़ फेंका। इससे उनके खिलाफ ऐसा माहौल बना जिसकी वजह से 1980 के चुनाव में वे रोनाल्ड रीगन से हार गए। जनता पार्टी की सरकार के दौरान भारत आए थे जिमी कार्टर जिमी कार्टर भारत के दौरे पर आने वाले अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थे। वो जनवरी 1978 में तीन दिन के दौरे पर भारत आए थे। जिमी कार्टर का यह दौरा तब हुआ था जब कुछ महीने पहले ही इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी को ऐतिहासिक जीत मिली थी और इंदिरा गांधी की हार हुई थी। जिमी कार्टर के इस दौरे से 1971 में भारत-पाकिस्तान जंग और 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण से दोनों देशों के बीच आया तनाव कम हुआ था। बीबीसी के मुताबिक कार्टर की मां लिलियन कई महीनों तक भारत में रही थीं। जब कार्टर भारत आए तो वो हरियाणा में गुरुग्राम के एक गांव दौलतपुर नसीराबाद भी गए थे। इसके बाद से उस गांव का नाम कार्टरपुरी रख दिया गया था। कार्टर चाहते थे भारत परमाणु हथियार हासिल न करे
साल 1974 में भारत ने बिना किसी को भनक लगे राजस्थान के पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया था। इससे अमेरिका नाराज हो गया था। इसके चलते भारत पर कई तरह के प्रतिबंध भी लगाए गए थे। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक जब जिमी कार्टर 1978 में भारत आए तो उन्हें पूरा यकीन था कि वो भारत से NPT यानी नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर साइन करवा लेंगे और हमेशा के लिए हमारे परमाणु हथियार हासिल करने का रास्ता बंद करवा देंगे। हालांकि ऐसा नहीं हो पााया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बड़ी चालाकी से उनके सामने तीन शर्तें रख दी। उन्होंने कहा कि भारत NPT पर साइन कर देगा अगर दुनिया की सभी परमाणु शक्तियां भी ऐसा कर दें। दूसरी शर्त में उन्होंने कहा कि कोई भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। तीसरी शर्त में उन्होंने कहा कि जितने देशों के पास परमाणु हथियार हैं अगर वो उन्हें खत्म कर देते हैं तो भारत भी कभी कोई परमाणु परीक्षण नहीं करेगा।

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